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राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय

  राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय धन्ना राजस्थान में धार्मिक आंदोलन का श्रीगणेश करने का श्रेय धन्ना को ही है।  धन्ना का जन्म टोंक जिले के धुवन गाँव में 1415 ई. में जाट परिवार में हुआ था।  बाल्यकाल से ही इनकी प्रवृत्ति धार्मिक थी।  कालांतर में धन्ना काशी जाकर आचार्य रामानन्द के शिष्य बन गए ।  गुरु रामानंद के प्रभाव से ये निर्गुण उपासक हो गये।  गुरु रामानंद ने इन्हें घर पर रहकर ही भक्ति करने का आदेश दिया। इन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय कृषि में रत रहते हुए ही आत्म शु‌द्धि का प्रयास किया। धन्ना गुरु भक्ति में बड़ी निष्ठा रखते थे।  इनका मत था कि गुरु भक्ति से ही परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इन्होंने नाम-स्मरण को ही ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन माना है तथा औपचारिकताओं और बाह्याडम्बरों का विरोध किया। पीपा खींची राजपूत पीपा गागरौन (झालावाड़) के शासक थे।  यहीं पर संत पीपा की छत्तरी है।  इनका जन्म 1425 ई. में हुआ माना जाता है।  कालोपरान्त पीपा काशी जाकर रामानन्द के शिष्य बन गए।  धन्ना के समान ही इन्हें भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए भक्...

लोक संगीत


लोक संगीत:-
  • यहाँ के लोक जीवन का इतिहास, सामाजिक और नैतिक आदर्श लोक संगीत में संरक्षित है। जीवन के प्रत्येक प्रसंग से संबंधित लोक गीत यहाँ पर उपलब्ध हैं। लोक संगीत का मूल आधार लोक गीत हैं जिन्हें विभिन्न उत्सवों व अनुष्ठानों में सामूहिक रूप से गाया जाता है। लोक-वाद्यों की संगति इनके माधुर्य में वृद्धि करती है।
  • रवीन्द्र नाथ टैगोर:- "लोक गीतों को संस्कृति का सुखद सन्देश ले जाने वाली कला कहा है।"
  • गाँधीजी:- "लोक गीत ही जनता की भाषा है, लोक गीत हमारी संस्कृति के पहरेदार हैं।"
  • स्टैंडर्ड डिकशनरी ऑफ फोकलोर माइथोलॉजी एण्ड लेजेण्ड:- "लोक गीत उस जनसमूह की संगीतमयी काव्य रचनाएं है जिसका साहित्य लेखनी अथवा छपाई से नहीं वरन् मौखिक परम्परा से अविरत संबद्ध रहता है।”
  • लोक गीत की तुलना शास्त्रीय संगीत से नहीं की जा सकती क्योंकि लोक गीत विविध विषयों यथा पारिवारिक व सामाजिक अवसरों, मौसम, संस्कार, पर्व-त्यौहार, देवी-देवता, विधि-विधान और कर्मकांड से संबंधित होते हैं । शास्त्रीय संगीत विषय के गंभीर ज्ञान से पैदा होता है जबकि लोक गीत दैनिक अनुभव और सच्चाइयों का सीधा-सपाट संप्रेषण करते हैं। शास्त्रीय संगीत का संबंध जहाँ बौद्धिकता से है, वहीं लोक गीत सीधे मानवीय भावनाओं से संबंधित होते हैं।
राजस्थान के लोक संगीत को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं:-
  1. लोक संगीत के प्रथम भाग में वे गीत आते हैं जो जन - सामान्य द्वारा विभिन्न अवसरों पर गाये जाते हैं।
  2. द्वितीय भाग में वे गीत हैं जो सामन्तशाही के प्रभाव से विकसित हुए। कई जातियों ने अपने आश्रयदाता राजा-महाराजा, जागीरदार–सामन्त आदि की प्रशस्ति में गीत गाकर इन्हें व्यावसायिक रूप में अपनाया।
  3. तीसरे भाग में वे गीत आते हैं जिनमें क्षेत्रीय प्रभाव प्रचुरता से दृष्टिगत होता है।
जन - सामान्य के लोक गीत:-
सर्वाधिक लोक गीत संस्कारों, त्यौहारों व पर्वों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा गाये जाते हैं। जन्म और विवाह संबंधी गीतों की संख्या अधिक है। वैवाहिक अवसर पर सगाई, बधावा, चाकभात, रतजगा, मायरा, हल्दी, घोड़ी, बना-बनी, वर निकासी, तोरण, हथलेवा, कंवर कलेवा, जीमणवार, काँकणडोरा, जला, जुआ-जुई आदि गीत गाये जाते हैं।
विवाह पूर्व वर-वधू की प्रेमाकांक्षा की अभिव्यक्ति बना-बनी के गीतों में मिलती है। 
विवाह के पूर्व वर को रिश्तेदारों के यहाँ आमंत्रित किया जाता है वहां से लौटते समय 'बिंदोला' (बंदोला) संबंधी गीत गाया जाता है। 
वर निकासी के मौके पर घुड़चढ़ी की रस्म के समय 'घोड़ी' गाई जाती है। 
वधू के घर की स्त्रियों द्वारा वर की बारात का डेरा देखने जाने का उल्लेख 'जला' गीतों में मिलता है। 
शिशु के जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीत 'जच्चा' कहे जाते हैं। इनमें सामान्यतः गर्भिणी की प्रशंसा, वंशवृद्धि का उल्लास और शिशु के लिए मंगलकामना जाती है।
त्यौहार व पर्व–गीतों में गणगौर, तीज, होली, रक्षाबंधन, दीपावली, नवरात्रि, मकर संक्रांति के अवसर पर गाये जाने वाले अनेक गीत हैं। गणगौर व तीज राजस्थान के विशेष पर्व हैं। गणगौर का पर्व चैत्र माह में सोलह दिनों तक कुंवारी कन्याओं व सधवा स्त्रियों द्वारा अनुष्ठानपूर्वक आयोजित किया जाता है। 

गणगौर का प्रसिद्ध गीत इस प्रकार है:-
"खेलण दो गणगौर भंवर म्हानें खेलण दो गणगौर,
म्हारी सखियाँ जोवे बाट हो भंवर म्हानें खेलण दो गणगौर।”
गणगौर व तीज के अवसर पर 'घूमर' नृत्य-गीत राजस्थान की पहचान बन चुका । 
गीत इस प्रकार है:-
“म्हारी घूमर छे नखराली ए मा गोरी घूमर रमवा म्है जास्याँ।”
तीज पर श्रावण माह के प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने वाले 'तीज' गीतों का गान किया जाता है। 
होली के समय फाल्गुन में पुरुषों की टोलियाँ रसिया, होरी, धमाल आदि गीत गाती हुई राजस्थान के में प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई पड़ती हैं ।
राजस्थान के ऋतु - गीतों में शरद, ग्रीष्म, वर्षा और बसंत के गीत जैसे फाग, बीजण, शियाळा, बारहमासा, होली, चेती और कजली, जाड़ा, सावन के गीतों में चौमासा, पपैयो, बदली, मोर संबंधित गीत और इन्द्रदेव की स्तुति आदि है।
लोक देवताओं में तेजाजी, देवजी, पाबूजी, गोगाजी, जुझारजी आदि वीर पुरुषों ने परमार्थ के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, अतः उनका गुणगान करने वाले अनेक भजन तन्मयता से गाये जाते हैं। 
लोक-देवियों में सती माता सीतला माता, दियाड़ी माता की पूजा आदि अत्यन्त श्रद्धा से की जाती है। इनकी आराधना में भजन गाये जाते हैं।
मीरां, कबीर, दादू, रैदास, चन्द्रसखी, बख्तावरजी आदि के पदों का गान तथा नाथपंथी व निर्गुणी भजन भी बहुत संख्या में मिलते हैं। 
भरतपुर व कामाँ में ब्रज संस्कृति के प्रभाव से कृष्ण लीलाओं संबंधी गान और करौली क्षेत्र में कैलादेवी भक्ति के 'लांगुरिया' गीत अति लोकप्रिय हैं।
राजस्थान की लोक-संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले अनेक विषयों के गीत भी मिलते हैं। इनमें आकांक्षाओं, भावों व प्रसंगों को प्रकृति या किन्हीं वस्तुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। ऐसे गीतों में ईंडोणी, कांगसियों, गोरबन्द, पणिहारी, लूर, ओळू, सुपणा, हिचकी, मूमल, कुरजाँ, काजलिया, कागा आदि अत्यन्त मधुर हैं। बच्चों के क्रीड़ा गीत, जादू-टोने से संबंधित कामण गीत आदि में लोक संगीत का सौन्दर्य दिखाई देता है।

व्यावसायिक जातियों के लोक गीत:-
राजस्थान में कई जातियों ने संगीत को व्यवसाय के रूप में अपनाया है। इनमें ढोली, मिरासी, लंगा, ढाढ़ी, कलावन्त, भाट, राव, जोगी, कामड़, वैरागी, गन्धर्व, भोपे, भवाई, राणा, कालबेलिया, कथिक आदि शामिल हैं। इनके गीत परिष्कृत, भावपूर्ण और वैविध्यमय होते हैं। इन्हें ख्याल एवं ठुमरी की तरह छोटी-छोटी तानों, मुरकियों व विशेष झटकों से सजाया जाता है। इन गीतों में माँड, देस, सोरठ, मारू, परज, कालिंगड़ा, जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू, खमाज आदि कई रागों की छाया प्रतिबिम्बित होती है|
राजस्थान की माँड गायकी अत्यन्त प्रसिद्ध है। सुविख्यात माँड गायिका पद्मश्री अल्लाह जिल्लाई बाई का गाया ‘पधारो म्हारे देस' पर्यटकों को खुला निमंत्रण है। विभिन्न क्षेत्रों में कुछ अंतर के साथ माँड के अनेक प्रकार प्रचलित हैं, जैसे- उदयपुर की माँड, जोधपुर की माँड, जयपुर - बीकानेर की माँड, जैसलमेर की माँड आदि ।
यहाँ के अधिकांश दोहे देस व सोरठ पर आधारित हैं। व्यावसायिक जातियों द्वारा युद्ध के समय गाये जाने वाले वीर रसात्मक गीत सिन्धु और मारू रागों पर आधारित थे। 

क्षेत्रीय लोक गीत:-
राजस्थान में भौगोलिक रूप से मरूस्थल, पर्वतीय क्षेत्र व समतल मैदान सभी विद्यमान है। 
  • मरूस्थलीय क्षेत्र:-
    • बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर आदि मरूस्थलीय क्षेत्र के गीत अधिक आकर्षक व मधुर होते हैं । उन्मुक्त वातावरण की वजह से यहाँ के लोक गीत ऊँचे स्वरों व लम्बी धुन तथा अधिक स्वर विस्तार वाले होते हैं ।
    • कुरजाँ, पीपली, रतन राणो, मूमल, घूघरी, केवड़ा आदि यहाँ के प्रमुख लोक गीत हैं। 
    • कामड़, भोपे, सरगड़े, लंगे, मिरासी, कलावन्त आदि यहाँ की प्रमुख संगीतज्ञ जातियाँ हैं।
  • पहाड़ी प्रदेश:-
    • राजस्थान के दक्षिणी पहाड़ी प्रदेश , जैसे- उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही तथा आबू में सामूहिक लोक गीतों का प्रचलन अधिक है। 
    • यहाँ भील, मीणा, गरासिया, सहरिया आदि जनजातियाँ निवास करती हैं। इनके गीतों की धुनें सरल, संक्षिप्त व कम स्वरों वाली होती हैं। 
    • मेवाड़ क्षेत्र के मुख्य लोक गीत पटेल्या, बीछियो, लालर, माछर, नोखीला, थारी ऊँटा री असवारी, नावरी असवारी, शिकार आदि है। 
    • उत्तरी मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध गीत हमसीढ़ों है जिसे स्त्री व पुरुष मिलकर गाते हैं।
  • समतलीय भाग:-
    • राजस्थान के समतलीय भाग में जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर क्षेत्र आते हैं । 
    • यहाँ भाषा और स्वर–रचना की दृष्टि से वैविध्ययुक्त गीत प्रचलित हैं। 
    • यहाँ भक्ति व शृंगार रस के गीतों का आधिक्य है।

 

इस प्रकार लोक संगीत की दृष्टि से राजस्थान एक समृद्ध प्रदेश है। रस की दृष्टि से यहाँ सर्वाधिक संख्या शृंगार-रस के गीतों की है। जिसमें वियोग शृंगार का वर्णन अधिक मिलता है, जिसके पीछे कारण यहाँ पुरुषों के जीविकोपार्जन अथवा व्यापार आदि हेतु परदेस गमन की प्रवृत्ति है। शृंगार रस पश्चात् शांत रस और फिर वीर रसात्मक गीत आते हैं।

बच्चों के खेल - गीत:-
खेल लड़के-लड़कियों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। खेलों में गीत और कविता होने से अधिक सरसता हो जाती है। इन गीतों की राग साधारण है फिर भी उनमें लय है:-

(1) कान कतरनी, कान कतरनी छब्बक छैया छब्बक छैया, बोल मेरा भैया।

(2) टम्पो घोड़ी फूल गुलाब रो। 

(3) काकड़ वेल मतीरा पाक्या टींडसियां का टोरा लाग्या, राजाजी राजाजी खोलो कुँवाड़ (छोटे बच्चों का)। 

(4) मछली मछली कितणो पाणी? हाँ मियाजी इतणो पाणी । (छोटे बच्चों का)।

(5) म्हारा महैलां पाछे कूण है ?

दीपावली के 15 दिन पहले ही लड़के और लड़कियों की टोलियाँ प्रायः सबके घर गाते हुए निकल जाती हैं। लड़कों के द्वारा गाये जाने वाले गीतों को 'लोवड़ी' अथवा 'हरणी' भी कहते हैं और लड़कियों के द्वारा गाये जाने वाले गीतों को 'घड़ल्यों' कहते हैं । ये मेवाड़ की ओर प्रचलित हैं। (राजस्थान का लोक संगीत : देवीलाल सामर; पृष्ठ 57-58)

क्या आप जानते हैं ?
(1) पुरुषों के गीत:- भजन, होली पर चंग के गीत, धमालें, मंदिरों के रात्रि जागरण, कीर्तन आदि । 
(2) बालकों के गीतों के अवसर:- चौक च्यानणी (गणेश चतुर्थी महोत्सव), ढप के गीत, धमालें, मंदिरों के रात्रि जागरण के भजन, दीपावली।
(3) स्त्रियों के गीतों के अवसर:- होली, तीज (चौमासा), गणगौर ( घूमर), विवाह, पुत्र - जन्मोत्सव, रातिजगे, हरजस, बारा मासिये, शीतला, पावणा के शुभागमन पर, कार्तिक स्नान, जच्चा, जात, जडूले एवं मेले ।
(4) बालिकाओं के गीतों के अवसर:- गणगौर, जीजा के आगमन पर, चानाचट के त्यौहार पर, तीज (झूले के गीत), होली, दीपावली ।

 

प्रमुख लोक गीत:-
1. झोरावा गीत:-  जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो पत्नी अपने पति के वियोग में गाती है।
2. सुवटिया:- उत्तरी मेवाड़ में भील जाति की स्त्रियां पति -वियोग में तोते (सूए) को संबोधित करते हुए यह गीत गाती है।
3. पीपली गीत:- मारवाड़ बीकानेर तथा शेखावटी क्षेत्र में वर्षा ऋतु के समय स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
4. सेंजा गीत:- यह एक विवाह गीत है, जो अच्छे वर की कामना हेतु महिलाओं द्वारा गया जाता है।
5. कुरजां गीत:- यह लोकप्रिय गीत में कुरजां पक्षी को संबोधित करते हुए विरहणियों द्वारा अपने प्रियतम की याद में गाया जाता है, जिसमें नायिका अपने परदेश स्थित पति के लिए कुरजां को सन्देश देने का कहती है।
6. जकडि़या गीत:- पीरों की प्रशंसा में गाए जाने वाले गीत जकडि़या गीत कहलाते है।
7. पपीहा गीत:- पपीहा पक्षी को सम्बोधित करते हुए गया गया गीत है। जिसमें प्रेमिका अपने प्रेमी को उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।
8. कागा गीत:- कौवे का घर की छत पर आना मेहमान आने का शगुन माना जाता है। कौवे को संबोधित करके प्रेयसी अपने प्रिय के आने का शगुन मानती है और कौवे को लालच देकर उड़ने की कहती है।
9. कांगसियों:- यह राजस्थान का एक लोकप्रिय श्रृंगारिक गीत है।
10. हमसीढो:- भील स्त्री तथा पुरूष दोनों द्वारा सम्मिलित रूप से मांगलिक अवसरों पर गाया जाने वाला गीत है।
11. हरजस:- यह भक्ति गीत है, हरजस का अर्थ है हरि का यश अर्थात हरजस भगवान राम व श्रीकृष्ण की भक्ति में गाए जाने वाले भक्ति गीत है।
12. हिचकी गीत:- मेवात क्षेत्र अथवा अलवर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत दाम्पत्य प्रेम से परिपूर्ण जिसमें प्रियतम की याद को दर्शाया जाता है।
13.  जलो और जलाल:- विवाह के समय वधु पक्ष की स्त्रियां जब वर की बारात का डेरा देखने आती है तब यह गीत गाती है।
14. दुप्पटा गीत:- विवाह के समय दुल्हे की सालियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
15. कामण:- कामण का अर्थ है - जादू-टोना। पति को अन्य स्त्री के जादू-टोने से बचाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है।
16. पावणा:- विवाह के पश्चात् दामाद के ससुराल जाने पर भोजन के समय अथवा भोजन के उपरान्त स्त्रियों द्वारा गया जाने वाला गीत है।
17. सिठणें:- विवाह के समय स्त्रियां हंसी-मजाक के उद्देश्य से समधी और उसके अन्य सम्बन्धियों को संबोधित करते हुए गाती है।
18. मोरिया गीत:- इस लोकगीत में ऐसी बालिका की व्यथा है, जिसका संबंध तो तय हो चुका है लेकिन विवाह में देरी है।
19. जीरो:- जालौर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। इस गीत में स्त्री अपने पति से जीरा न बोने की विनती करती है।
20. बिच्छुड़ो:- हाडौती क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जिसमें एक स्त्री जिसे बिच्छु ने काट लिया है और वह मरने वाली है, वह पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है।
21. पंछीडा गीत:- हाडौती तथा ढूढाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो त्यौहारों तथा मेलों के समय गाया जाता है।
22. रसिया गीत:- रसिया होली के अवसर पर ब्रज, भरतपुर व धौलपुर क्षेत्रों के अलावा नाथद्वारा के श्रीनाथजी के मंदिर में गए जाने वाले गीत है।
23. घूमर:- गणगौर अथवा तीज त्यौहारों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा घूमर नृत्य के साथ गाया जाने वाला गीत है, जिसके माध्यम से नायिका अपने प्रियतम से श्रृंगारिक साधनों की मांग करती है।
24. औल्यूं गीत:- ओल्यू का मतलब 'याद आना' है।बेटी की विदाई के समयय गाया जाने वाला गीत है।
25. लांगुरिया:- करौली की कैला देवी की अराधना में गाये जाने वाले भक्तिगीत लांगुरिया कहलाते है।
26. गोरबंध:- गोरबंध, ऊंट के गले का आभूषण है। मारवाड़ तथा शेखावटी क्षेत्र में इस आभूषण पर गीत गाया जाता है।
27. चिरमी:- चिरमी के पौधे को सम्बोधित कर बाल ग्राम वधू द्वारा अपने भाई व पिता की प्रतिक्षा के समय की मनोदशा का वर्णन है।
28. पणिहारी:- इस लोकगीत में राजस्थानी स्त्री का पतिव्रता धर्म पर अटल रहना बताया गया है।
29. इडुणी:- यह गीत पानी भरने जाते समय स्त्रियों द्वारा गाया जाता है। इसमें इडुणी के खो जाने का जिक्र होता है।
30. केसरिया बालम:- यह एक प्रकार का विरह युक्त रजवाड़ी गीत है जिसे स्त्री विदेश गए हुए अपने पति की याद में गाती है।
31. धुडला गीत:- मारवाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है, जो स्त्रियों द्वारा घुड़ला पर्व पर गाया जाता है।
32. लावणी गीत(मोरध्वज, सेऊसंमन- प्रसिद्ध लावणियां):- लावणी से अभिप्राय बुलावे से है। नायक द्वारा नायिका को बुलाने के सन्दर्भ में लावणी गाई जाती है।
33. मूमल:- जैसलमेर क्षेत्र का लोकप्रिय गीत, जिसमें लोद्रवा की राजकुमारी मूमल का सौन्दर्य वर्णन किया गया है। यह एक श्रृंगारिक गीत है।
34. ढोला-मारू:- सिरोही क्षेत्र का लोकप्रिय गीत जो ढोला-मारू के प्रेम-प्रसंग पर आधारित है, तथा इसे ढाढ़ी गाते है।
35. हिण्डोल्या गीत:- श्रावण मास में राजस्थानी स्त्रियां झुला-झुलते समय यह गीत गाती है।
36. जच्चा गीत:- बालक के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला गीत है इसे होलरगीत भी कहते है।

लोक गायन शैलियां:- 

1. माण्ड गायन शैली:–
  • 10 वीं 11 वीं शताब्दी में जैसलमेर क्षेत्र माण्ड क्षेत्र कहलाता था। अतः यहां विकसित गायन शैली माण्ड गायन शैली कहलाई।
  • एक श्रृंगार प्रधान गायन शैली है।
  • प्रमुख गायिकाएं:- 
    • अल्ला-जिल्हा बाई (बीकानेर) - केसरिया बालम आवो नही पधारो म्हारे देश। 
    • गवरी देवी (पाली)– भैरवी युक्त मांड गायकी में प्रसिद्ध। 
    • गवरी देवी (बीकानेर)– जोधपुर निवासी सादी मांड गायिका ।
    • मांगी बाई (उदयपुर)– राजस्थान का राज्य गीत प्रथम बार गाया। 
    • जमिला बानो (जोधपुर)
    • बन्नों बेगम (जयपुर):- प्रसिद्ध नृतकी "गोहरजान" की पुत्री है।

 

2. मांगणियार गायन शैली:–
  • राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र विशेषकर जैसलमेर तथा बाड़मेर की प्रमुख जाति मांगणियार जिसका मुख्य पैसा गायन तथा वादन है।
  • मांगणियार जाति मूलतः सिन्ध प्रान्त की है तथा यह मुस्लिम जाति है।
  • प्रमुख वाद्य यंत्र कमायचा तथा खड़ताल है।
  • कमायचा तत् वाद्य है।
  • इस गायन शैली में 6 रंग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है।
  • प्रमुख गायक:-
    • सदीक खां मांगणियार (प्रसिद्ध खड़ताल वादक)
    • साकर खां मांगणियार (प्रसिद्ध कमायचा वादक)
3. लंगा गायन शैली:–
  • लंगा जाति का निवास स्थान जैसलमेर-बाड़मेर जिलों में है।
  • बडवणा गांव (बाड़मेर) " लंगों का गांव" कहलाता है।
  • यह जाति मुख्यतः राजपूतों के यहां वंशावलियों का बखान करती है।
  • प्रमुख वाद्य यत्र कमायचा तथा सारंगी है।
  • प्रसिद्ध गायकार:-
    • अलाउद्दीन खां लंगा 
    • करीम खां लंगा
4. तालबंधी गायन शैली:–
  • औरंगजेब के समय विस्थापित किए गए कलाकारों के द्वारा राज्य के सवाईमाधोपुर जिले में विकसित शैली है।
  • इस गायन शैली के अन्तर्गत प्राचीन कवियों की पदावलियों को हारमोनियम तथा तबला वाद्य यंत्रों के साथ सगत के रूप में गाया जाता है।
  • वर्तमान में यह पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय है।
5. हवेली संगीत गायन शैली:–
  • प्रधान केन्द्र नाथद्वारा (राजसमंद) है।
  • औरंगजेब के समय बंद कमरों में विकसित गायन शैली।
 
प्रश्न -
1. पटेल्या, बीछियों, लालर क्या है?
(अ) लोक नृत्य
(ब) लोक गीत
(स) लोक नाट्य
(द) वाद्य यंत्र
2. लांगुरिया गीत किस देवी / देवता से संबंधित हैं?
(अ) जीण माता
(ब) खाटूश्यामजी
(स) कैला देवी
(द) श्री महावीरजी
3. अल्लाह जिल्लाई बाई की प्रसिद्धी का कारण है
(अ) माँड गायन
(स) कुरजां गायन
(ब) नृत्य
(द) रावण - हत्था


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  राजस्थान की  प्रथाएं/ कुप्रथाएं  सती प्रथा: –  भारत के अन्य क्षेत्रों के साथ राजपूताना में प्रचलित मृत पति के साथ जीवित विधवा पत्नी का चित्तारोहण कर जलकर नष्ट कर लेना। सहगमन / सहमरण- सती प्रथा की   प्रक्रिया अनुमरण- मृत पति के चिह्न / निशानी के   साथ जीवित विधवा पत्नी का  चित्तारोहण कर जलकर नष्ट कर लेना। महासती – अनुमरण करने वाली सती। माँ-सती – मृत पुत्र के साथ सती होने वाली माताएं।  राजस्थान में सर्वप्रथम सती प्रथा को बूंदी नरेश राव विष्णु सिंह ने 1822 ई. में गैर-कानूनी घोषित किया। राजा राम मोहन राय के प्रयासों से  तत्कालीन ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा 4 दिसंबर ,  1829 को बंगाल सती रेग्युलेशन पास किया गया था। इस कानून के माध्यम से पूरे ब्रिटिश भारत में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। 1829 के अधिनियम के तहत् रोक कोटा रियासत ने लगाई। सती प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य 510 ई. के   एरण अभिलेख (शासक- भानुगुप्त) से प्राप्त होता है।   राजस्थान में घटियाला अभिलेख 810 ई. में राजपूत ...

राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी साहित्य राजस्थान में साहित्य प्रारम्भ में संस्कृत व  प्राकृतभाषा में रचा गया। अभिलेख साहित्य अभिलेख—   शिलालेखों , अभिलेखों , सिक्कों तथा मोहरों पर उत्कीर्ण साहित्य को अभिलेख साहित्य का जाता है। राजस्थान का प्रारंभिक साहित्य इसी में मिलता है।   काल के आधार पर राजस्थानी साहित्य का विभाजन— प्राचीन काल ( 1050–1550 ई.)— वीरगाथा काल पूर्व मध्यकाल ( 1450–1650 ई.)— भक्ति काल   उत्तर मध्यकाल ( 1650–1850 ई.)— श्रंगार , रीति एवं नीति परक काल   आधुनिक काल ( 1850 ई. से )— विविध विषयों एवं विधाओं से युक्त काल     1. प्राचीन काल ( 1050–1550 ई.) —   पश्चिमी दिशा से होने वाले हमलों  के कारण वीर नायकों के आदर्श को प्रस्तुत करने के लिए वीर रसात्मक काव्यों का सृजन किया गया, जिस कारण इस काल को वीरगाथा काल नाम दिया गया। रणमल छंद (श्रीधर व्यास) इस काल की महत्त्वपूर्ण रचना है। जैन रचनाकारों की रचनाएं भी उल्लेखनीय हैं।   2. पूर्व मध्यकाल ( 1450–1650 ई.) —   विभिन्न युद्धों से धर्म एवं संस्कृति में व्य...