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राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय

  राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय धन्ना राजस्थान में धार्मिक आंदोलन का श्रीगणेश करने का श्रेय धन्ना को ही है।  धन्ना का जन्म टोंक जिले के धुवन गाँव में 1415 ई. में जाट परिवार में हुआ था।  बाल्यकाल से ही इनकी प्रवृत्ति धार्मिक थी।  कालांतर में धन्ना काशी जाकर आचार्य रामानन्द के शिष्य बन गए ।  गुरु रामानंद के प्रभाव से ये निर्गुण उपासक हो गये।  गुरु रामानंद ने इन्हें घर पर रहकर ही भक्ति करने का आदेश दिया। इन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय कृषि में रत रहते हुए ही आत्म शु‌द्धि का प्रयास किया। धन्ना गुरु भक्ति में बड़ी निष्ठा रखते थे।  इनका मत था कि गुरु भक्ति से ही परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इन्होंने नाम-स्मरण को ही ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन माना है तथा औपचारिकताओं और बाह्याडम्बरों का विरोध किया। पीपा खींची राजपूत पीपा गागरौन (झालावाड़) के शासक थे।  यहीं पर संत पीपा की छत्तरी है।  इनका जन्म 1425 ई. में हुआ माना जाता है।  कालोपरान्त पीपा काशी जाकर रामानन्द के शिष्य बन गए।  धन्ना के समान ही इन्हें भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए भक्...
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प्रमुख अकादमी

प्रमुख  अकादमी राजस्थान में राजस्थान साहित्य अकादमी- ➯राजस्थान में साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी। ➯राजस्थान साहत्य अकादमी की स्थापना 28 जनवरी 1958 को राजस्थान के उदयपुर जिले में की गई थी। ➯राजस्थान साहित्य अकादमी के द्वारा राजस्थान में दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार मीरा पुरस्कार है। ➯राजस्थान साहित्य अकादमी के द्वारा राजस्थान में प्रथम मीरा पुरस्कार सन् 1959-60 में रामानन्द तिवारी को दिया गया था। राजस्थान संस्कृत अकादमी- ➯राजस्थान में राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना करने का मुख्य उद्देश्य संस्कृत भाषा को लोकप्रिय बनाना तथा राजस्थान में उपलब्ध संस्कृत साहित्य को प्रकाशित करना है। ➯राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना सन् 1980 में राजस्थान के जयपुर जिले में संस्कृत दिवस के दिन की गई थी। ➯राजस्थान संस्कृत अकादमी के द्वारा राजस्थान में दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार माघ पुरस्कार है। राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी- ➯राजस्थान में राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी की स्थापना करने का मुख्य उद्देश्य ब्रजभाषा का प्रचार प्...

बांसवाड़ा के प्रमुक पर्यटन स्थल

 बांसवाड़ा:- सुनहरे द्वीपों का शहर राजस्थान के सुदूर दक्षिणांचल में अरावली की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित बांसवाड़ा की स्थापना महारावल जगमालसिंह ने की। वागड़ (बांसवाड़ा - डूंगरपुर) - मेवाड़, मालवा एवं गुजरात की संस्कृति का संगम स्थल है। बांसवाड़ा प्राकृतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक, सांस्कृतिक, रमणीक, धार्मिक एवं कलात्मक दृष्टि से परिपूर्ण है। बांस, सागवान यहाँ बहुतायत में पाया जाता है। जंगल एवं पानी की प्रचुरता के कारण इसे राजस्थान का ‘चेरापूंजी’ कहा जाता है। वागड़ क्षेत्र को समृद्ध करने वाली ‘वाग्वर गंगा’ जिसे माही सागर कहा गया है, - माही बाँध के कारण बने टापुओं को ‘‘सिटी ऑफ हण्ड्रेड आईलैण्ड्स’’ के नाम से जाना जाता है। आनंद सागर झील महारावल जगमल सिंह की रानी लंची बाई द्वारा इस झील का निर्माण किया गया था। बाई तालाब के नाम से लोकप्रिय यह मीठे पानी की कृत्रिम झील है। यह झील बांसवाड़ा के पूर्वी भाग में स्थित है तथा यहाँ कल्प वृक्ष भी हैं। कहते हैं, जो भी यहाँ आ कर अपनी इच्छा मांगता है वह पूरी हो जाती है। करीब ही राज्य के शासकों की छतरियाँ व स्मारक भी बने हुए हैं। अब्दुल्ला पीर यह बोहर...

अजमेर के प्रमुख पर्यटन स्थल

अजमेर:— ख़्वाज़ा की नगरी 7 वीं शताब्दी में राजा अजयपाल चौहान ने इस नगरी की स्थापना ‘अजय मेरू’ के नाम से की। यह 12वीं सदी के अंत तक चौहान वंश का केन्द्र था। जयपुर के दक्षिण पश्चिम में बसा अजमेर शहर, अनेक राजवंशों का शासन देख चुका है। 1193 ई. में मोहम्मद ग़ौरी के आक्रमण तथा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद, मुगलों ने अजमेर को अपना ईष्ट स्थान माना।  1. अजमेर शरीफ दरगाह अजमेर में सर्वाधिक देशी व विदेशी पर्यटक ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मन्नत मांगने तथा मन्नत पूरी होने पर चादर चढ़ाने आते हैं। सभी धर्मों के लोगों में ख़्वाजा साहब की बड़ी मान्यता है। दरगाह में तीन मुख्य दरवाजे़ हैं। मुख्य द्वार, ’निज़ाम दरवाज़ा’ निज़ाम हैदराबाद के नवाब द्वारा बनवाया गया, मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया ’शाहजहाँ दरवाजा’ और बुलन्द सुल्तान महमूद ख़िलजी द्वारा बनवाया गया ’बुलन्द दरवाजा’। उर्स के दौरान दरगाह पर झंडा चढ़ाने की रस्म के बाद, बड़ी देग (तांबे का बड़ा कढ़ाव) जिसमें 4800 किलो तथा छोटी देग में 2240 किलो खाद्य सामग्री पकाई जाती है। जिसे भक्त लोग प्रसाद के तौर पर बाँटते हैं। श्रद्धालु अपनी ...