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राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय

  राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय धन्ना राजस्थान में धार्मिक आंदोलन का श्रीगणेश करने का श्रेय धन्ना को ही है।  धन्ना का जन्म टोंक जिले के धुवन गाँव में 1415 ई. में जाट परिवार में हुआ था।  बाल्यकाल से ही इनकी प्रवृत्ति धार्मिक थी।  कालांतर में धन्ना काशी जाकर आचार्य रामानन्द के शिष्य बन गए ।  गुरु रामानंद के प्रभाव से ये निर्गुण उपासक हो गये।  गुरु रामानंद ने इन्हें घर पर रहकर ही भक्ति करने का आदेश दिया। इन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय कृषि में रत रहते हुए ही आत्म शु‌द्धि का प्रयास किया। धन्ना गुरु भक्ति में बड़ी निष्ठा रखते थे।  इनका मत था कि गुरु भक्ति से ही परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इन्होंने नाम-स्मरण को ही ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन माना है तथा औपचारिकताओं और बाह्याडम्बरों का विरोध किया। पीपा खींची राजपूत पीपा गागरौन (झालावाड़) के शासक थे।  यहीं पर संत पीपा की छत्तरी है।  इनका जन्म 1425 ई. में हुआ माना जाता है।  कालोपरान्त पीपा काशी जाकर रामानन्द के शिष्य बन गए।  धन्ना के समान ही इन्हें भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए भक्...

राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी साहित्य

राजस्थान में साहित्य प्रारम्भ में संस्कृत व प्राकृतभाषा में रचा गया।


अभिलेख साहित्य अभिलेख— 

  • शिलालेखों, अभिलेखों, सिक्कों तथा मोहरों पर उत्कीर्ण साहित्य को अभिलेख साहित्य का जाता है।
  • राजस्थान का प्रारंभिक साहित्य इसी में मिलता है।

 

काल के आधार पर राजस्थानी साहित्य का विभाजन—

  1. प्राचीन काल (1050–1550 ई.)— वीरगाथा काल
  2. पूर्व मध्यकाल (1450–1650 ई.)— भक्ति काल 
  3. उत्तर मध्यकाल (1650–1850 ई.)— श्रंगार, रीति एवं नीति परक काल 
  4. आधुनिक काल (1850 ई. से )— विविध विषयों एवं विधाओं से युक्त काल

 

 

1. प्राचीन काल (1050–1550 ई.) 

  • पश्चिमी दिशा से होने वाले हमलों के कारण वीर नायकों के आदर्श को प्रस्तुत करने के लिए वीर रसात्मक काव्यों का सृजन किया गया, जिस कारण इस काल को वीरगाथा काल नाम दिया गया।
  • रणमल छंद (श्रीधर व्यास) इस काल की महत्त्वपूर्ण रचना है।
  • जैन रचनाकारों की रचनाएं भी उल्लेखनीय हैं।

 

2. पूर्व मध्यकाल (1450–1650 ई.) 

  • विभिन्न युद्धों से धर्म एवं संस्कृति में व्यापक प्रभाव पड़ने लगा।
  •  जन सामान्य भक्ति की ओर प्रवृत्त होने लगा। 
  • कई संतों और भक्तों का उदय हुआ, जिन्होंने सभी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध सद्भावना की कल्पना को मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयास किया और अनेक रचनाएं रची। 
  • संतो तथा भक्तों की रचनाओं की अधिकता के कारण इस काल को भक्ति काल नाम दिया गया।
  • रामसनेही, दादू पंथ, नाथ पंथ, अलखिया संप्रदाय विश्नोई संप्रदाय, जसनाथी संप्रदाय आदि प्रमुख हैं। इन्होंने निर्गुण उपासना व गुरु की महत्ता पर बल दिया।
  • साथ सगुण भक्त कवियों ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों में जनजागृति फैलाई। भक्त शिरोमणि मीराबाई के पद, पृथ्वीराज राठौड़ की "वैली किशन रुक्मणी री", माधोदास दधावाड़िया की "रामरासो" इसरदास की ''हरिरस'' और "देवयांण" सयाजी झूला की "नागमण" इस क्रम की प्रमुख रचनाएं हैं।

 

3. उत्तर मध्यकाल (1650–1850 ई.) 

  • यह समय राजनीतिक दृष्टि से शांति का काल रहा, जिससे राज्य में कलाकारों और साहित्य को संरक्षण प्रदान किया गया।  
  • साहित्य और कला के विविध आयामों में श्रंगार, रीति तथा नीति से संबंधित रचनाएं प्रस्तुत की गई, जिस कारण इसे श्रंगार, रीति एवं नीति परक काल कहा जाता है।
  • काव्य शास्त्रों से संबंधित रचनाएं—रघुनाथ रूपक ( मछाराम )
  • संबोधन परक नीति रचनाएं — राजिया रा सोरठा, चकरीय रा सोरठा, भेरिया रा सोरठा, मोतिया रा सोरठा आदि

 

आधुनिक काल (1850 ई. से ) 

  • 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद समाज में नवीन चेतना का विस्तार हुआ और सभी वर्गों पर व्यापक असर पड़ा जिससे साहित्य में आधुनिक चेतना का विकास हुआ, जिसे साहित्य में आधुनिक काल नाम दिया गया।इस साहित्य का प्रारंभ मारवाड़ के कविराज बाकी दास और बूंदी के सूर्यमल मिश्रण ने किया।

 

राजस्थानी गद्य-पद्य की विशिष्ट शैलियां--

ख्यात –

  • देशी राज्यों के राजाओं द्वारा अपने सम्मानसफलताओं और विशेष कार्यों आदि के विवरण के रूप में लिखवाया गया इतिहास
  • 'दयालदास री ख्यातमें बीकानेर के राव बीकाजी से लेकर महाराजा अनूपसिंह तक का इतिहास संचित है।
  • मुहणोत्त नैणसी द्वारा रचित 'मुहणोत नेणसी री ख्यातइस परंपरा की विशिष्ट रचना है|
  • ख्यात भी दो प्रकार की मिलती है:-
    1. प्रथम श्रेणी की ख्यात में किसी भी नरेश व किसी राजवंश का क्रमबद्ध इतिहास उपलब्ध होता हैउदा. दयालदास री ख्यात'
    2. जबकि दूसरी श्रेणी की ख्यात में अलग-अलग घटनाओं का उल्लेख मिलता है और वह क्रमबद्ध नहीं होताउदा. मुहणोत्त नैणसी री ख्यात

1. मुहणौत नैणसी री ख्यात-

  •  इस ख्यात का लेखक मुहणौत नैणसी है, जो जोधपुर के शासक जसवन्तसिंह का दीवान था।
  • मुहणौत नैणसी को जयपुर निवासी मुंशीदेवी प्रसाद ने राजपूताना का अबुल- फजल कहा हैं।
  • मुहणौत नैणसी री ख्यात राजस्थान की सबसे प्राचीन तथा सबसे विश्वसनीय ख्यात भी हैं।
  • इस ख्यात को राजस्थान का प्रथम ऐतिहासिक ग्रन्थ माना जाता हैं।
  • इस ख्यात में जोधपुरगुजरातमालवा व बुन्देलखण्ड के राजपूत राजाओं का विस्तृत रूप से वर्णन मिलता हैं।
  • इस ग्रन्थ में राजपूतों की 26 शाखाओं का वर्णन किया गया है।
  • इस ग्रन्थ की खास विशेषता यह है कि इस ग्रन्थ में कहीं भी ‘ह‘ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ हैं।
  • यह ख्यात मारवाड़ी की डिंगल में रचित हैं।
  • स्मरणीय तथ्य – मुहणौत नैणसी के ग्रन्थ मारवाड़ रा परगना री विगत को राजस्थान का गजेटियर कहा जाता हैं। इसमें मारवाड़ राज्य की ख्यात खूब विस्तृत हैं इसलिए इसे ‘‘सर्वसंग्रह’’ भी कहा जाता हैं।

 2. बांकीदास री ख्यात (जोधपुर राज्य की ख्यात)-

  • जन्म 1771 में भांडिया ग्राम में हुआ था|
  • बांकीदास जोधपुर के शासक मानसिंह राठौड़ के दरबारी था।
  • महाराजा ने उनको अपना भाषा गुरु बनाया|
  • राजा के व्यवहार से बांकीदास इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अन्य किसी नरेश का आश्रय न लेने का प्रण ले लिया था|
  • इसने राजस्थान के राजाओं द्वारा अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के सम्बन्ध में कहा कि-‘‘आयो अंग्रेज मुल्क रे उपर‘‘
  • इस ग्रंथ को अति विश्वसनीय मानते हुए डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं- लेखक के घटनाओं के समकालीन होने के कारण इस पर अधिक विश्वास किया जा सकता है|
  • स्मरणीय तथ्य – 2 खण्डों में विभाजित अलग से जोधपुर राज्य की ख्यात की रचना मुरारीदास ने की थी।

 

3. ’’मुण्डीयार री ख्यात’’ (राठौड़ों री ख्यात) –

  • मुण्डीयार री ख्यातका सम्बन्ध जोधपुर के राठौड़ों से है।  
  • इस ख्यात की एक प्रति सीतामउ के नटनागर संस्थान में उपलब्ध हैं।
  • जोधपुर नरेश जसवंत सिंह के समय लिखी थी।
  • इस ख्यात में मारवाड़ के प्रत्येक राजा का जन्म उस का राज्यभिषेक और उसके स्वर्गवास का तिथिक्रम दिया गया है|

4. दयालदास री ख्यात –

  • दयालदास री ख्यात का सम्बन्ध मुख्यतया बीकानेर के राठौड़ों से है।
  • यह ख्यात 2 खण्डों में विभाजित है।
  • प्रथम खण्ड में मारवाड़ के राठौड़ों का प्रारम्भ से लेकर जोधा तक का वर्णन हैं।
  • द्वितीय खण्ड में बीकानेर के राव बीका से लेकर सरदार सिंह तक का वर्णन हैं।
  • दयालदास ने यह रचना सूरतसिंह के काल में की थी।
  • इसमें प्रसंग वंश जोधपुर के राठौरों का भी उल्लेख आ गया है|


वचनिका-

 

  • संस्कृत के 'वचनशब्द से
  • एक काव्य विधा के रूप में साहित्य में प्रचलित हुआ।
  • वर्चानेकाएक ऐसी तुकान्त गद्य-पद्य रचना है जिसमें अंत्यानुप्रास मिलता हैयद्यपि इसके अपवाद भीमिलते हैं|
  • 'अचलदास खींची री वचनिका'- शिवदास गाडण
  • 'राठौड़ रतनसिंघ महेसदासोत री वचनिका'- खिड़िया जग्गा री

 

दवावैत-

  • कलात्मक गद्य का एक अन्य रूप हैजो वचनिका काव्य रूप की तरह हीं है। वचनिका राजस्थानी में लिखी होती हैंकिन्तु दवावैत उर्दू और फारसी के शब्दों से युक्त होंती है |
  • इनमें कथा के नायक का गुणगानराज्य-वैभवयुद्धआखेटनखशिख आदि का वर्णन तुकान्त और प्रवाहयुक्त होता है।
  • 'अखमाल देवडा री दवावैत', 'महाराणा जवानसिंह री दवावैत', 'राजा जयसिंह री दवावैतआदि प्रमुख दवावैत ग्रंथ हैं।

 

बात-

  • कहानी की तरह वात कहने और सुनने की विशेष विधा है। कथा कहने वाला कहता चलता है और सुनने वाला 'हुँकारा' (बीच-बीच में हाँ जैसे शब्दों का प्रयोगजिससे कथाकार को लगे कि श्रोता रुचि ले रहा है) देता रहता है |
  • इन वातों में जीवन के हर पक्षयुद्धधर्मदर्शनमनोरंजन पर प्रकाश डाला गया हैं।
  • गद्यमयपद्यमय तथा गद्य-पद्यमय तीनों रूपों में वातें मिलती हैं।
  • 'राव अमरसिंहजी री वात', 'खींचियां री वात', 'पाबूजी री वात', 'कान्हड़दे री वात', 'अचलदास खींची री वातआदि प्रमुख वातें हैं।


झमाल-

  • झमाल राजस्थानी काव्य का मात्रिक छन्द है।
  • इसमें पहले पूरा दोहाफिर पांचवें चरण में दोहे के अंतिम चरण को दोहराया जाता है |
  • राव इन्द्रसिंह री झमालप्रसिद्ध है।

 

झूलणा-

  • झूलणा राजस्थानी काव्य का मात्रिक छन्‍द है | इसमें चौबीस अक्षर के वर्णिक छन्‍द के अंत में यगण होता है|
  • 'अमरसिंह राठौड़ रा झूलणा', 'राजा गजसिंह-रा-झूलणा', 'राव सुरतांण-देवडे-रा-झूलणाआदि प्रमुख झूलणा रचनाएं हैं |


परचीं-

  • संत्त-महात्माओं का राजस्थानी भाषा में पद्यबद्ध जीवन परिचय।  
  • 'संत नामदेव री परची', “कबीर री परची', 'संत रदास री परची', 'संत पीपा री परची', 'संत दादू री परची', 'भीराबाई री परचीआदि प्रमुख परची रचनायें हैं।


प्रकास-

  • किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियों को प्रकास कहा गया है।
  • किशोरदास का 'राजप्रकास' आशिया मानसिंह का 'महायश प्रकास', कविया करणीदान का 'सूरज प्रकासआदि प्रमुख प्रकास ग्रंथ हैं।


मरस्या-

  • राजा या किसी व्यक्ति विशेष की मृत्यु के बाद शोक व्यक्त करने के लिए रचित काव्य|
  • इसमें उस व्यक्ति के चारित्रिक गुणों के अतिरिक्त अन्य महान कार्यो का वर्णन भी किया जाता था।
  • 'राणे जगपत रा मरस्यामेवाड़ महाराणा जगतसिंह की मृत्यु पर शोक प्रकट करने के लिए लिखा गया था।

 

रासो-

  • मोतीलाल मेनारिया के अनुसार, “जिस काव्य ग्रंथ में किसी राजा की कीर्तिविजययुद्धवीरता आदि का विस्तृत वर्णन होउसे रासो कहते हैं|”
      1.  'पृथ्वीराज रासो'- चन्द्रबरदाई
      2. 'बीसलदेव रासो'- नरपति नाल्‍ह
      3. 'सगत रासोगिरधर आसिया  
      4. 'खुमाण रासो'- दौलत विजय का
      5. 'रतन रासो'- कुम्भकर्ण का
      6. 'हम्मीर रासो'- जोधराज

 

रूपक-

  • किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों के स्वरूप को दर्शाने वाली काव्य कृति रूपक कहलाती है |
  • 'गजगुणरूपक', 'रूपक गोंगादेजी रो', 'राजरूपकआदि प्रमुख रूपक काव्य हैं।

 

विगत-

  • विगत से किसी विषय का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है | इसमें इतिहास की दृष्टि से शासकउसके परिवारराज्य के क्षेत्र प्रमुख व्यक्ति अथवा उनके राजनीतिकसामाजिक व्यक्तित्व का वर्णन मिलता है।
  • विगत में उपलब्ध आंकड़े आर्थिक दृष्टि से भी उपयोगी रहे हैं |
  • मुहणोत नैणसी की 'मारवाड़  रा परगनां री विगतमें प्रत्येक परगने की आबादीरेखभूमि किस्मफसलों का हालसिंचाई के साधन आदि की जानकारियां प्राप्त होती हैं।

 

वेलि-

  • वेलि ग्रंथ 'वेलियोछन्‍द में लिखे हुए हैंइनके विविध विषय रहे हैजो धार्मिकऐतिहासिक रहे हैं।
  • 'दईदास जैतावत री वेलि', रतनसी खीवावत री वेलितथा 'राव रतन री वेलिप्रमुख वेलि ग्रंथ हैं । 
  • वेलि परंपरा की प्रमुख रचना पृथ्वीराज राठौड़ की लिखी हुई 'वेलि किसण रूकमणी री' है|


साखी-

  • साखी साक्षी शब्द से बना है।
  • संत कवियों ने अपने द्वारा अनुभव किये गये ज्ञान का वर्णन|
  • साखियों में सोर॒ठा छन्‍द का प्रयोग हुआ है |
  •  कबीर की साखियां प्रसिद्ध हैं।


सिलोका-

  • सिलोका साधारण पढ़े-लिखे लोगों द्वारा लिखे गये हैंइसलिए ये जनसाधारण की भावनाओं को आमजन तक पहुँचाते हैं|
  • 'राव अमरसिंह रा सिलोका', 'अजमालजी रो सिलोको', “राठौड़ कुसलसिंह रो सिलोको', माटी केहरसिंह रो सिलोकोआदि प्रमुख सिलोके हैं | 

मध्यकालीन साहित्यिक उपलब्धियाँ

  • राजस्थान में साहित्य प्रारम्भ में संस्कृत व प्राकृतभाषा में रचा गया। 
  • मध्ययुग के प्रारम्भकाल से अपभ्रंश और उससे जनित मरूभाषा और स्थानीय बोलियां जैसे-मारवाडीमेवाड़ीमेवात्तीदूँढाड़ी और बागड़ी में साहित्य की रचना होतीं रहीपरन्तु इस काल में संस्कृत्त साहित्य अपनी प्रगति करता रहा।

 

संस्कृत साहित्य

  • राजपूताना के विद्यानुरागी शासकोंराज्याश्रय प्राप्त विद्वानों ने संस्कृति का सृजन किया हैशिला लेखों, प्रशस्तियों और वंशावलियों के लेखन में इस भाषा का प्रयोग किया जाता था। महाराणा कुम्भा स्वयं विद्वान संगीत प्रेमी एवं विद्वानों के आश्रयदाता शासक थे।
  • इन्होंने संगीतराजसूढ़ प्रबन्धसंगीत भीमांसारकिक प्रिया, (गीत गोविन्द की टीका) संगीत रत्नाकर आदि ग्रन्थों की रचना की थी।
  • इनके आश्रित विद्वान मण्डन ने शिल्पशास्त्र से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों जिनमें (देवमूर्तिप्रकरण, राजवल्लभरूपमण्डनप्रसाद मण्डन) की रचना की |
  • महत्त्वपूर्ण कुंभाकालीन (चित्तौड़गढ़) और कुंभलगढ़ प्रशस्ति (कुंभलगढ़) की रचना विद्वान मण्डन ने की।
  • राणा जगतसिंह के दरबार में बाबू भट्ट नामक विद्वान था, जिसने जगनन्‍नाथराम प्रशस्ति की रचना की।
  • राजसिंह के दरबार में रणछोड़ भट्ट नामक विद्वान थेजिसने
  • राजसिंह प्रशस्ति की रचना की।
  • ये दोनों प्रशस्तियाँ मेवाड़ के इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है ।
  • आमेर-जयपुर के महाराजा मानसिह, सवाईजयसिंहमारवाड़ के महाराजा जसवन्तसिंहअजमेर के चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ तथा पृथ्वीराज तृत्तीय बीकानेर के रायसिंह और अनूपसिंह संस्कृत के विद्वान एवं विद्वानों के आश्रयदाता शासक थे।
  • अनूपसिंह ने बीकानेर में 'अनूप संस्कृत पुस्तकालयका निर्माण करवाकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने 'हरिकेलि' नाटक लिखा।  
  • पृथ्वीराज के कवि जयानक 'पृथ्वीराजविजय' नामक काव्य के रचचिता थे।
  • प्रतापगढ़ के दरबारी पंडित जयदेव का 'हरिविजयनाटक तथा गंगाराममट्ट का 'हरिभूषणइस काल की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
  • मारवाड़ के जसवन्तसिंह ने संस्कृत में ‘भाषा-भूषण और आनन्द विलास’ नामक अष्ठ ग्रंथ लिखें।
  • जोधपुर के मानसिंह ने नाथ-चरित्र नामक ग्रंथ लिखा |
  • मानसिंह को पुस्तकों से इतना प्रेम था कि उन्होंने काशीनेपाल आदि से संस्कृत के अनेक ग्रंथ मंगवाकर अपने पुस्तकालय में सुरक्षित रखें।
  • आज यह पुस्तकालय मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र के रूप में विख्यात है।

 

राजस्थानी भाषा में साहित्य

  • राजस्थानी समस्त राजस्थान की भाषा रही है।
  • जिसके अन्तर्गत मेवाड़ीमारवाड़ीदूढाड़ींहाड़ौतीबागड़ी,
  • मालवीं और मेवातती आदि बोलियाँ आती है।
  • इस भाषा में जैनशैलीचारणशैलीसंतशैली और लोकशैली में साहित्य का सृजन हुआ है।

 

(1)          जैनशैली का साहित्य –

  • जैनशैली का साहित्य जैन धर्म से सम्बन्धित हैं।
  • इस साहित्य में शान्तरस की प्रधानता हैं|
  • हेमचन्द्रसूरी(11वींसदी) का 'देशीनाममाला', 'शब्दानुशासन', ऋषिवर्धन सूरी का “नल दमयन्ती रास', धर्म समुद्रगणि का 'रात्रि भोजनरस', हेमरत्न सूरी का गौरा बादल री चौपाई प्रमुख साहित्य हैं।

 

(2)          चारणशैली का साहित्य –

  • राजपूत युग के शौर्य तथा जनजीवन की झांकी इसी साहित्य की देन है।
  • इसमें वीर तथा श्रृंगार रस की प्रधानता रही है।
  • चारणशैली में रास, ख्यातदूहा आदि में गद्यपद्य रचनाएँ हुई है|
  • बादर ढाढी कृत 'वीर भायणचारण शैली की प्रारम्भिक रचना है।
  • चन्दवरदाई का 'पृथ्वीराजरासों', नेणसी की 'नेणसीरीख्यात', बाँकीदास की 'बाँकीदासरीख्यातदयालदास की 'दयालदासरी ख्यातगाडण शिवदास की 'अचलदास खींची री वचनिकाप्रमुख ग्रन्थ हैं, जिनमें राजस्थान के इतिहास की झलक मिलती है।
  • दोहा छनन्‍द में ढोला मारू रा  दूहा, सज्जन रा दूहा प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
  • इनके अतिरिक्त दुरसा आढ़ां का नाम भी विशिष्ठ उल्लेखनीय है। वह हिन्दू संस्कृति और शौर्य का प्रशंसक तथा भारतीय एकता का भक्त था।
  • बीकानेर नरेश कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ ने 'वेलि क्रिसन रूकमणी री' नामक ग्रंथ की रचना कीजो राजस्थानी साहित्य का ग्रंन्‍थ माना जाता है।
  • इन गुणों की ध्वनि इसके गीतोंछन्दोंझुलका तथा दोहा में स्पष्ट सुनाई देती है।
  • सूर्यमलल मीसण आधुनिक काल का महाकवि था और बून्दी राज्य का कवि था। इसने “वंश भास्करऔर 'वीर सतसई' जैसी उल्लेखनीय कृतियों की रचना की।

 

(3)          सन्त साहित्य –

  • राजस्थान के जनमानस को प्रभावित करने वाला सन्त साहित्य बड़ा मार्मिक है।
  • सन्‍तों ने अपने अनुभवों को भजनों द्वारा नैतिकताव्यावहारिकता को सरलता से जनमानस में प्रसारित किया हैऐसे सन्तों में मल्‍लीनाथजी, जांभो जीजसनाथ जीदादू की वाणीमीरा की 'पदावली' तथा “नरसीजी रो माहेरो', रामचरण जी की 'वाणी' आदि संत साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

 

(4 ) लोक साहित्य –

  • लोकसाहित्य में लोकगीत, लोकगाथाएँप्रेमगाथाएँलोकनाट्यपहेलियाँ, फड़ें तथा कहावतें सम्मिलित है।

  • वाणीनिष्ठा की विशेषता पर लिखित साहित्य को लोक साहित्य का गया हैजो श्रवण परंपरा से प्राप्त होता रहा है।
  • राजस्थान में फड़ बहुत प्रसिद्ध है।
  • फड़ चित्रण वस्त्र पर किया जाता है।
  • जिसके माध्यय से किसी ऐतिहासिक घटना अथवा पौराणिक कथा का प्रस्तुतिकरण किया जाता है।
  • फड़ में अधिकतर लोक देवताओं यथा- पाबूजीदेवनारायण रामदेवजी इत्यादि के जीवन की घटनाओं और चमत्कारों का चित्रण होता है।
  • फड़ का उपयोग चारणभोपे करते हैं।
  • राजस्थान में शाहपुरा (भीलवाड़ा) का फड़ चित्रण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाये हुए है।
  • भीलवाड़ा के श्रीलाल जोशी ने फड़ चित्रण को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में सहयोग किया।
  • इस कार्य हेतु भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा है|
  • इनमें पाबूजी री फड़, 'देवजी री फड़' तीज, गणगौर, शादी, संस्कारों, मेलों पर गाये जाने वाले लोकगीत आते है।


आधुनिक राजस्थानी साहित्य

 

मारवाड़ के कविराजा बांकीदास तथा बूंदी के सूर्यमलल मीसण/मिश्रण  ने राजस्थानी जन मानस में जिस राष्ट्रीय चेतना का बीज बोया थावहीं आगे चलकर आधुनिक काल के अनेक कवियों की कविताओं में प्रकट हुआ। इन्हीं के साथ हींगलाजदान कविया और शंकरदान सामोर का भी नाम लिया जाना जरूरी है।

कवि ऊमरदान की कविताओं में संवत्‌ 1956 के अकाल से दुःखी जनता का मार्मिक चित्रण किया है। साथ ही पाखण्डी साधुओं को बेनकाब किया गया है|

रामनाथ कविया ने 'द्रोपदी विनयसे नारी चेतना को जागृत किया।

केसरीसिंह बारहठविजयसिंह पथिकजयनारायण व्यासहीरालाल शास्त्रीगोकूल भाई भट्टमाणिक्यलाल वर्माजनकवि गणेशीलाल व्यास राजस्थान के ऐसे कवि हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लेने के साथ ही इस लड़ाई के लिए अपनी कलम को भी हथियार बनाया |

इनमें से गणेशीलाल ब्यास ऐसे कवि हैं जिन्होंने खुद आजादी की लड़ाई में भाग लिया और आजादी के बाद के अपने मोहभंग को भी कविताओं में प्रखर रूप से प्रकट किया है |

रेवतदान चारण की रचनाएं सामन्ती शोषण के प्रति आमजन को जगाने का काम करती हैं।

राजस्थानी के अनेक कवियों ने जन-जन तक अपनी बात पहुँचाने के लिए कवि सम्मेलनों को माध्यम बनाया |

राजस्थानी कवि मेघराज मुकुल की 'सेनाणीकवि सम्मेलनों की सर्वाधिक

लोकप्रिय कविताओं में मानी जाती थीं |

सत्यप्रकाश जोशी अपने मौलिक और गैर पारंपरिक सोच के साथ अलग ही स्थान रखते हैं।

1960 ई. में प्रकाशित उनकी काव्य कृति राधा इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि जहाँ आम राजस्थानी कविता युद्ध का गौरव गान करती हैंवहीं जोशी अपनी नाथिका राधा के माध्यम से श्रीकृष्ण को यह संदेश देकर कि भयंकर युद्ध टाल देंयुद्ध  के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं|

इसी प्रकार कन्हैयालाल सेठिया (जिनके गीत 'धरती धोरां री' को तो राजस्थान का आदर्श गीत भी कहा जा सकता है)मींझरऔर 'लीलटॉससेठिया जी के प्रमुख काव्य संग्रह हैं।


सातवें दशक के मध्य तक राजस्थान की आधुनिक कविता का पहला दौर चला।

 राजस्थान में राजस्थानी भाषा में 'मरुवाणी', 'जलमभोम', 'जांणकारी', 'लाडेसर',  'राजस्थली', 'ईसरलाट', 'राजस्थानी-एक हेलो', 'दीठ', 'ओळमो', 'हरावळ', 'चामळ' अपरंचजैसी अनेक साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही थीं और इनके माध्यम से बहुत सारे नए कवि सामने आ रहे थे |

यही वह समय है जब नई राजस्थानी रचनाओं ने राजस्थानी साहित्य को नई ऊँचाईयां प्रदान कीं ।

पारस अरोड़ा की जुड़ाव

गोरधनसिंह शेखावत की गाँव

तेजसिंह जोधा की 'कठैई कीं व्हेगौ है'

मणि मधुकर की 'सोजती गेट', 'पगफेरो'

हरीश भादाणी की 'बोले सरणाटो', 'बाथां में भूगोल'

चन्द्रप्रकाश देवल की 'पागी','कावड', 'मारग'

अर्जुनदेव चारण की 'रिन्दरोद्दी'

मालचन्द तिवाड़ीं 'कीं उत्तर॒यों है आभौ'


शिवचंद्र भरतिया को राजस्थानी का प्रथम आधुनिक गद्यकार कहा जा सकता है।

राजस्थानी नाटक रचना का सूत्रपात इन्होंने ही किया।

इन्हें राजस्थान का भारतेंदु माना जाता है।

नाटक - फाटक जंजाल, केसर विलास (राजस्थानी भाषा का प्रथम नाटक ), बुढ़ापा की सगाई।

आधुनिक उपन्यास साहित्य के प्रवर्तक शिवचंद भर्तियां के उपन्यास कनक सुंदर को आधुनिक राजस्थानी उपन्यास साहित्य का प्रथम उपन्यास माना जाता है ।

रानी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत ने राजस्थान के अत्तीत कों सजीव करने वाली ऐतिहासिक सांस्कृतिक गरिमापूर्ण कहानियां लिखीं-

'मांझळ रात'

'अमोलक वाता''

'मूमळ'

'गिर ऊंचा ऊंचा गढ़ां

'कै रे चकवा बात' आदि।

विजयदान देथा ने अपनी 'बातां री फूलवाडी' (3 खण्ड) श्रृंखला में राजस्थान की यत्र-तत्र बिखरी लोककथाओं का कुछ ऐसा अनूठा संकलन किया कि उन्हें खूब प्रसिद्धि मिली |

विजयदान देथा के कुछ प्रमुख राजस्थानी-हिन्दी कहानी संग्रह हैं-

'दुविधा'

'उलझन'

'अलेखूं हिटलर'

'सपन प्रिया'

'अंतराल'

'दुविधानामक विंजयदान देथा की कृति पर तो 'पहेलीनामक फिल्म का निर्माण भी हो चुका है।

इनकी कृति 'चौधराइन की चतुराई' को भी बेहद पसंद किया जाता हैं |


यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की

कहानियां उनके संग्रहों- 'जमारो', 'समन्द अर थार'

उपन्यास हैं-- 'हूं गोरी किण पीव री', 'जोग-संजोग', 'चान्दा सेठाणीआदि |

 

नथमल जोशी के

कहानी संग्रह:- परण्योडी-कंवारी

उपन्यास:-

 'आभै पटकी'

 'धोरां रौ धोरी'

'एक बीनणी दो बीन'

 

प्रसिद्ध कहानीकारों में डॉ. नृसिंह राजपुरोहितअन्नाराम

सुदामारामेश्वर दयाल श्रीमालीडॉ. मनोहर शर्मासांवरदईया आदि प्रमुख हैं।

 

साहित्यिक पत्रकारिता-

  • राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता का वैभवपूर्ण इतिहास रहा है।
  • इन साहित्यिकलघु व अनियतकालीन पत्रिकाओं ने राजस्थान के लेखन को ही गति प्रदान करने के साथ ही हिन्दी प्रदेशों के साहित्यकारों को भी एक मंच प्रदान किया है-
    1. बीकानेर की वातायन (हरीश भादानी)
    2. अजमेर की लहर (प्रकाश जैन)
    3. भरत्तपुर की ओर (विजेन्द्र)
    4. कांकरोली की सम्बोधन (कमर मेवाड़ी)
    5. अलवर की कविता (भागीस्थ भार्गव)
    6. उदयपुर की बिन्दु आदि ने अनेक लेखकों को गंभीर व स्तरीय मंच प्रदान किया |
  • सम्प्रेषण (चन्द्रभानु भारद्वाज)मधुमाधवी (नलिनी उपाध्याय) के साथ राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका 'मधुमती' ने भी राजस्थान में साहित्यिक वातावरण बनाने में योगदान दिया |
  • राजस्थानी भाषा की पत्रिकाओं में प्रमुख हैं:-
    1. राजस्थानी भाषासाहित्य एवं संस्कृति अकादमीबीकानेर की 'जागती जोत'
    2. सत्यप्रकाश जोशी की 'हरावल'
    3. किशोर कल्पनाकांत की 'ओल्यूं'
    4. कवि चन्द्रसिंह द्वारा स्थापित 'मरुवाणी'
  • साहित्य का भण्डार इतना विपुल है कि उसका सम्पूर्ण वर्णन करना किसी एक सीमा में सम्भव नहीं है।

 आधुनिक राजस्थानी साहित्य  के क्षेत्र 

राजस्थान की गिनती देश के हिन्दी भाषी प्रदेशों में होती है और यहां सामान्य बोलचाल की, और उसी के साथ सरकारी कामकाज की भाषा हिन्दी है।

शिक्षा का माध्यम भी हिन्दी ही है।

लेकिन इसी के साथ, आम जन-जीवन में राजस्थानी का भी उतना ही प्रयोग होता है।

राजस्थान के अधिकांश बाशिन्दे अपनी जन-भाषा में बात कर अधिक सहजता और आत्मीयता अनुभव करते हैं।

इस तरह राजस्थान की दो मुख्य भाषाएं हैं-

1. राजस्थानी 

2. हिन्दी

 लेकिन इस विविधता भरे प्रदेश में इन दो भाषाओं के अतिरिक्त अलग-अलग जगहों और अवसरों पर अंग्रेज़ी, ब्रज, उर्दू, सिंधी, पंजाबी का भी पर्याप्त प्रयोग होता है। इनका केवल प्रयोग होता है, इनमें साहित्य सृजन भी होता है।

राजस्थान सरकार ने भी विभिन्न भाषाओं के साहित्य के संवर्धन के लिए हिन्दी के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी के अतिरिक्त संस्कृत अकादमी, उर्दू अकादमी, सिंधी अकादमी, ब्रज अकादमी गठित कर रखी है और पंजाबी अकादमी की घोषणा की जा चुकी है।

ये सभी अकादमियाँ अपनी-अपनी भाषाओं और साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए नियमित गतिविधियाँ आयोजित करती हैं और स्वभावतः उन गतिविधियों से इन भाषाओं के प्रति अनुराग रखने वाले और उन्हें बोलने-बरतने वाले लाभान्वित होते हैं।

यहाँ हम राजस्थान की दो मुख्य भाषाओं हिन्दी व राजस्थानी के साहित्य की विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

 

हिन्दी साहित्य

 

राजस्थान में जहां राजस्थानी साहित्य की परंपरा बहुत पुरानी और पुष्ट है, खड़ी-बोली हिन्दी साहित्य की परंपरा उतनी पुरानी नहीं है। खड़ी बोली हिन्दी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विन्ध्य-गाँगेय क्षेत्र के विभिन्न सामाजिक-साँस्कृतिक आन्दोलनों की भाषा बन गई थी और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में मुख्यतया उसी क्षेत्र में चले स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान इसका तेजी से विकास और विस्तार भी हुआ। परन्तु राजस्थान में विभिन्न कारणों से सामाजिक-सांस्कृतिक नवाचार और स्वाधीनता आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक से हो पाई। इसीलिए हिन्दी का चलन भी यहाँ लगभग उसी समय हो पाया। चलन के बाद भी उसे पूरी तरह रचने-बसने और साहित्य की भाषा बनने में दो-तीन दशक और लगे।

 

राजस्थान में बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक के दौरान अनेक नवाचार दिखाई पड़ने लगे थे। उनके लिए पृष्ठभूमि रियासतों में चलने वाले दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द और गोविन्द गिरि और उन जैसे अन्य अनेक पुरोधाओं के धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण आन्दोलनों ने तैयार की। 1913 में विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में पहले बिजोलिया और फिर उसके बाद उसके प्रभाव से बून्दी और जयपुर के किसानों ने आन्दोलन किए। दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में भील आन्दोलन हुआ। इसी दौरान रियासतों में सामन्ती शोषण, दमन और अन्याय के विरोध के लिए प्रजामण्डलों और प्रजापरिषदों की स्थापना भी हुई। इन व्यापक नवाचारों और आन्दोलनों से प्रदेश में हिन्दी का प्रसार तो हुआ लेकिन उसकी पहुंच समाज के विशिष्ट वर्गों तक ही सीमित रही। आम लोगों तक उसकी जड़ों का फैलाव यहाँ की रियासतों के भारतीय संघ में विलय के बाद ही हुआ। इस विलय के कारण यहां आवागमन और संचार की सुविधाएँ विस्तृत हुई। इससे विन्ध्य-गांगेय प्रदेशों के हिन्दी भाषी समाज और साहित्य से हमारा सम्पर्क सघन हुआ। इस तरह सही अर्थो में तो राजस्थान में हिन्दी को सम्पर्क, शिक्षा और साहित्य की भाषा के रूप में स्वीकृति और मान्यता बीसवीं सदी के पांचवें-छठे दशक में ही मिल सकी। राजस्थान में हिन्दी में व्यापक और सार्थक सक्रियता का विस्तार छठे दशक के दौरान हुआ। यह वही समय है जब प्रान्त के सात प्रमुख कवियों की सहकारी काव्य-पुस्तक सप्त किरण (1955) और राँगेय राघव की बहु-प्रशंसित औपन्यासिक कृति 'कब तक पुकारूं '(1957) का प्रकाशन हुआ। कहना अनावश्यक है कि ये सात कवि इससे काफी पहले से सृजनरत थे और रांगेय राघव इससे पहले अनेक उपन्यास लिख चुके थे।

राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना भी इसी दौरान 1958 में हुई।

 

कविता

 

राजस्थान में कवि-कर्म की बहुत लम्बी और सुदृढ़ परंपरा रही है लेकिन खड़ी बोली हिन्दी में यही कवि कर्म बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में प्रारम्भ हुआ। यहाँ की रियासतों में सामन्तों और अंग्रेजों की दुहरी पराधीनता के विरुद्ध जो जनान्दोलन हुए, उसके बहुत सारे कार्यकर्ता कवि थे। सामन्ती दमन और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के लिए जनसाधारण को प्रेरित करने के लिए इन कार्यकर्ता कवियों ने गीत-कविताओं का सहारा लिया। ऐसे कवियों में विजयसिंह पथिक, जयनारायण व्यास, हरिभाऊ उपाध्याय, माणिक्य लाल वर्मा, गोकुल भाई भट्ट, हीरालाल शास्त्री, काला बादल और सुमनेश जोशी मुख्य हैं। इन कवियों की कविता में उच्च कोटि की कलात्मकता की अपेक्षा यह बात महत्वपूर्ण है कि ये सभी मनुष्य के मुक्ति के लिए संघर्ष में उसे हथियार बनाते हैं। वैसे, यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस जनान्दोलन से थोड़ा पहले हिन्दी की मुख्यधारा की जो रचनात्मकता थी उस पर भी उपदेश, उद्बोधन और इतिवृत्तात्मकता का वर्चस्व था। राजस्थान में भी कुछ कवि इससे प्रभावित हुए । ये सभी कवि पहले ब्रजभाषा में लिखते थे और फिर खड़ी बोली में लिखने लगे थे। इन कवियों में पुरोहित प्रताप नारायण, पुरुषोत्तम दास चतुर्वेदी, और पण्डित गिरधर शर्मा नवरत्न प्रमुख हैं। राजस्थान में हिन्दी के रच-बस जाने के बाद कवि-कर्म का भी विस्तार हुआ। सुधीन्द्र, शकुन्तला कुमारी रेणु, कन्हैयालाल सेठिया, कर्पूरचन्द्र कुलिश, प्रकाश आतुर, मनोहर प्रभाकर, ताराप्रकाश जोशी, मरुधर मृदुल, कमलाकर, राजकुमारी कौल आदि ने लगभग इसी समय अपनी पहचान और प्रतिष्ठा का विस्तार किया। इन कवियों की सक्रियता अधिक समय तक इसलिए रही क्योंकि इनके सरोकार, भावभूमियाँ और काव्य शैलियाँ समय के अनुसार बदलते रहे। इनमें से अधिकांश कवि अपने समय के सभी रुझानों और आन्दोलनों जैसे छायावाद, उत्तर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता आदि से भी जुड़े रहे।

बादली / बादळी चंद्रसिंह विरकाली द्वारा लिखित आधुनिक राजस्थान की प्रथम काव्यकृति एवं स्वतंत्र प्रकृति चित्रण की प्रथम कृति है।

राजस्थान के जिन कवियों में छायावादी प्रवृत्तियाँ बहुत अच्छी तरह से देखी जा सकती हैं उनमें सुधीन्द्र, कन्हैया लाल सेठिया, ज्ञान भारिल्ल, घनश्याम शलभ, परमेश्वर द्विरेफ, दयाकृष्ण विजय, कमलाकर और राजकुमारी कौल प्रमुख हैं। रांगेय राघव, गणपतिचन्द्र भण्डारी, मेघराज मुकुल, प्रकाश आतुर आदि की अनेक कविताओं में प्रगतिवादी प्रवृत्तियां बहुत मुखर हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' (1943) और फिर उनके ही द्वारा संपादित 'दूसरा सप्तक' से हिन्दी कविता में भावबोध और रूप शिल्प के स्तर पर जो बदलाव आए, राजस्थान की हिन्दी कविता में भी वे सब रूपायित हुए । कन्हैयालाल सहल, कन्हैयालाल सेठिया, रामगोपाल शर्मा दिनेश, जयसिंह नीरज, नन्द चतुर्वेदी और प्रकाश आतुर की उस काल की बहुत सारी कविताओं में आधुनिक भावबोध और प्रयोगशीलता की पदचापें सुनी जा सकती हैं। कन्हैयालाल सहल ने तो अपनी पहली काव्य कृति का नाम ही 'प्रयोग' रखा था। यहीं यह उल्लेख कर देना आवश्यक होगा कि हिन्दी राजस्थान में साहित्य और कवि कर्म की भाषा भले ही देर से बनी, राजस्थान के साहित्य ने हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा के समानान्तर चलने में कोई देर नहीं की।

प्रयोगवाद के बाद आने वाली नई कविता और उसके बाद की साठोत्तरी कविता में प्रदेश के जिन कवियों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है उनमें नन्द चतुर्वेदी, विजेन्द्र, नन्दकिशोर आचार्य, हरीश भादानी, ऋतुराज, मणि मधुकर, जयसिंह नीरज, जुगमंदिर तायल, रणजीत, योगेन्द्र किसलय, रामदेव आचार्य, कमर मेवाड़ी, विश्वम्भर नाथ उपाध्याय, भागीरथ भार्गव, सुधा गुप्ता, भगवती लाल व्यास, रमा सिंह, प्रकाश जैन प्रमुख हैं। इन कवियों में से हरीश भादानी ने अपनी पत्रिका 'वातायन, प्रकाश जैन ने 'लहर' और कमर मेवाड़ी ने 'संबोधन' के माध्यम से भी प्रान्त के काव्य परिदृश्य अर्थवत्ता प्रदान की। राजस्थान में कविता को लेकर सातवें आठवें दशक में विशेष उत्साह का माहौल रहा। इसके बाद देश और दुनिया के परिदृश्य में जो बहुत बड़े बदलाव आए, और खास तौर पर संचार माध्यमों का जिस तरह से विस्तार हुआ उसने कविता को प्रतिकूलतः प्रभावित किया। लेकिन इसके बावजूद राजस्थान में हिन्दी कविता की धारा निरन्तर प्रवाहित होती रही है। इधर जो कवि दृश्य पर अपनी काव्यात्मक सक्रियता से आश्वस्त करते हैं उनमें नन्द भारद्वाज, हेमन्त शेष, गोविन्द माथुर, प्रेमचन्द गाँधी, हरीश करमचन्दानी, विनोद

पदरज, अम्बिका दत्त, ओमेन्द्र, रमाकान्त शर्मा, कृष्ण कल्पित, अजन्ता देव, मीठेश निर्मोही, सवाई सिंह शेखावत प्रमुख हैं।

 

कथा साहित्य

 

राजस्थान में कथा साहित्य की परंपरा काफी पुरानी है। यह याद रखना ज़रूरी होगा कि वह परंपरा हिन्दी की नहीं अपितु राजस्थानी की है। जहां तक हिन्दी का प्रश्न है, गद्य का प्रयोग और प्रचलन विलम्ब से होने का असर कथा साहित्य पर पड़ना स्वाभाविक था। राजस्थान में हिन्दी कहानी के आरम्भिक मील के पत्थर के रूप में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का नाम लिया जा सकता है। मात्र तीन कहानियों के इस लेखक की ‘उसने कहा था' नामक कहानी जून 1915 में 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और अब भी हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में अपना स्थान बनाए हुए है। गुलेरी जी के बाद के कहानीकारों में ओंकारनाथ दिनकर, शम्भू दयाल सक्सेना, विष्णु अम्बालाल जोशी, मोहनसिंह सेंगर और जनार्दन राय नागर के नाम महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान के कथाकारों में एक बहुत आवश्यक नाम है रांगेय राघव का। विलक्षण प्रतिभा के धनी इस कथाकर ने मात्र 39 वर्ष की जिन्दगी में अन्य अनेक रचनाओं के अतिरिक्त ग्यारह कहानी संग्रह हिन्दी को दिए । इनकी 'गदल' कहानी अविस्मरणीय है।

 

आज़ादी के बाद यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, परदेशी, राजनन्द, सुमेर सिंह दइया, मणि मधुकर, पानू खोलिया, मन्नू भण्डारी आदि अनेक महत्वपूर्ण कथाकार राजस्थान ने हिन्दी को दिए। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र ने राजस्थान के सामन्ती अतीत को अपनी कहानियों में चित्रित किया तो मणि मधुकर ने इस प्रान्त के रेतीले यथार्थ को शब्द बद्ध किया। पानू खोलिया की कहानियां मानव मन की सूक्ष्म पड़ताल के लिए याद की जाती हैं तो रमेश उपाध्याय और स्वयंप्रकाश की अपनी वैज्ञानिक चेतना के लिए | सन् साठ के बाद तो राजस्थान की कहानी हिन्दी की कहानी के समानान्तर ही चलने लगी। ईश्वर चन्दर, स्वयंप्रकाश, रमेश उपाध्याय, आलमशाह खान, मोहर सिंह यादव, हबीब कैफी, कमर मेवाड़ी, हसन जमाल, सूरज पालीवाल, हरदर्शन सहगल, मालचन्द तिवाड़ी, सत्यनारायण, रघुनन्दन त्रिवेदी, श्याम जांगिड़, रत्नकुमार सांभरिया, माधव नागदा, अनिरुद्ध उमट, आनन्द ‘संगीत, लवलीन, मनीषा कुलश्रेष्ठ को बहुत व्यापक स्वीकृति मिली है। 1

कहानी ही की भांति उपन्यास में भी यही हुआ कि मेहता लज्जा राम का पहला उपन्यास 'धूर्त रसिक लाल' (1899) और बून्दी के ही अपेक्षाकृत कम चर्चित कथाकार रामप्रताप 'नरदेव' लगभग साथ-साथ आए परन्तु ये किसी परंपरा का निर्माण नहीं कर सके। फिर भी स्वाधीनता प्राप्ति से पहले के उपन्यासकारों में जनार्दन राय नागर, श्रीगोपाल आचार्य, शम्भूदयाल सक्सेना का कृतित्व महत्व का अधिकारी है। जनार्दन राय नागर का 'जगदगुरु शंकराचार्य' साढे पाँच हज़ार पृष्ठों और दस खण्डों का एक विराट उपन्यास है।

 

राजस्थान के जिन उपन्यासकारों ने अपने कृतित्व से सबसे ज्यादा ध्यान आकृष्ट किया उनमें पहला नाम रांगेय राघव का है। 'मुर्दों का टीला', और 'कब तक पुकारूं' जैसे अमर उपन्यासों के इस रचनाकार का सृजन विपुल भी है और वैविध्यपूर्ण भी। इन्होंने जीवन चरितमूलक उपन्यासों की तो एक पूरी श्रृंखला ही रच दी थी। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र ने भी बहुत अधिक संख्या में उपन्यास लिखे हैं और उनमें भी विषयगत वैविध्य पर्याप्त है, हालांकि उनका प्रिय क्षेत्र राजस्थान का सामन्ती अतीत रहा है। परदेशी ने भी अनेक ऐतिहासिक उपन्यास लिखे और उनमें से ‘भगवान बुद्ध की आत्मकथा’ की कलात्मक उत्कृष्टता को बहुत सराहा गया है। विपुल औपन्यासिक सृजन करने वाले एक और कथाकार हैं राजेन्द्र मोहन भटनागर। आपने ऐतिहासिक, सामाजिक, जीवन चरितात्मक, मनोवैज्ञानिक, प्रयोगशील सभी तरह के उपन्यास लिखे हैं। विश्वम्भर नाथ उपाध्याय ने 'जाग मछन्दर गोरख आया' और 'जोगी मत जा' में अतीत की तरफ तो 'रीछ' और 'पक्षधर' में वर्तमान की तरफ नज़र डाली।

रांगेय राघव (काका, कब तक पुकारूं, धरती मेरा घर, आखिरी आवाज़), मणि मधुकर (सफेद मेमने, पत्तों की बिरादरी, पिंजरे में पन्ना), मोहर सिंह यादव (बंजर धरती) और अन्ना राम सुदामा (आंगन नदिया) ने अपने उपन्यासों में राजस्थान के लोक जीवन को केन्द्र में रखा है और ये उपन्यास एक सीमा तक आंचलिक उपन्यास कहे जा सकते हैं। वैसे राजस्थान के अंचल को यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र ने भी अपने कुछ उपन्यासों का आधार बनाया है लेकिन उनका ध्यान परिवेश चित्रण पर कम और कथा कहने पर अधिक रहा है।

 

राजस्थान के जिन उपन्यासकारों ने अपने सृजन के बल पर अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त की है उनमें पानू खोलिया (सत्तर पार के शिखर, टूटे हुए सूर्य बिंब), रमेश उपाध्याय (चक्रबद्ध, दण्डद्वीप, स्वप्नजीवी, हरे फूल की खुशबू), मन्नू भण्डारी (महाभोज, आपका बण्टी), शरद देवड़ा (कॉलेज स्ट्रीट के नए मसीहा, टूटती इकाइयां), स्वयंप्रकाश (ज्योतिरथ के सारथी, जलते जहाज पर, संधान, ईधन), अशोक शुक्ल (प्रोफेसर पुराण, हड़ताल हरिकथा, सेवा मीटर) प्रभा सक्सेना( अन्तर्यात्रा, टुकड़ों में बंटा इन्द्रधनुष), लवलीन(स्वप्न ही रास्ता है), हबीब कैफी (अनायक, गमना, रानी साहिबा, सफिया), मालचन्द तिवाड़ी (पर्यायवाची), हरिराम मीणा (धूणी तपे तीर), मृदुला बिहारी (कुछ अनकही), लता शर्मा (सही नाप के जूते) मनीषा कुलश्रेष्ठ (शिगाफ़) प्रमुख हैं।

 

नाटक और रंगमंच

 

राजस्थान में बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में एक तरफ तो लोक नाटकों की परंपरा विद्यमान थी, दूसरी तरफ धार्मिक लीला नाटकों की परंपरा थी और तीसरी तरफ अंग्रेजी पढा-लिखा वर्ग आधुनिक नाटकों की तरफ भी बढ रहा था। इसके अलावा सामाजिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुधार के लिए भी नाटक लिखे और मंचित किए जा रहे थे। यह सारा रंग कर्म व्यावसायिक और शौकिया दोनों ही स्तरों पर हो रहा था। उस समय रियासतों से भी इसे प्रोत्साहन और संरक्षण मिल रहा था। झालावाड़ की विख्यात भवानी नाट्यशाला और जयपुर के रामप्रकाश और मानप्रकाश थिएटर इसी दौर में बने। पारसी रंगमंच शैली की अनेक थिएटर कम्पनियां और सोसायटियां सकिय रहीं। प्रान्त के प्रारम्भिक नाटककारों में शम्भू दयाल सक्सेना, वृद्धिचन्द मधुर और हरिनारायण मेघवाल के नाम महत्वपूर्ण हैं सक्सेना जी के नाटकों में पौराणिक कथानकों को पश्चिमी तकनीक के साथ प्रस्तुत करने का कौशल था तो मधुर जी ने पारसी शैली में लगभग तीस-चालीस नाटक रचे। उनका एक नाटक 'जागो बहुत सोए' ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित भी किया गया। इनके बाद के नाटककारों में ओंकारनाथ दिनकर, मोहनसिंह सेंगर, सरनाम सिंह शर्मा अरुण उल्लेखनीय हैं।  देवी लाल सामर ने रंग तकनीक को ध्यान में रखकर अनेक लघु नाटक भी लिखे ।

पूरे हिन्दी जगत की ही तरह राजस्थान में भी आधुनिक रंग कर्म सातवें दशक तक आते-आते परवान चढ़ा। दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित अनेक रंगकर्मियों की पहल पर राजस्थान के कई शहरों और कस्बों में शौकिया रंग संस्थाएं बनीं और नाट्य गतिविधियों को विस्तार मिला। इस दौर में राजस्थान के जिन नाटककारों को पहचान और प्रतिष्ठा मिली उनमें नन्दकिशोर आचार्य (पागलघर, देहान्तर, गुलाम बादशाह, किसी और का सपना), भानु भारती (चन्द्रमा उर्फ चमकू सिंह, कथा कही एक जले पेड़ ने), मणि मधुकर (रस गंधर्व, बुलबुल सराय, दुलारीबाई, खेला पोलमपुर), हमीदुल्ला (उलझी आकृतियां, एक और युद्ध, समय सन्दर्भ, कथा भारमली, उत्तर उर्वशी), रिज़वान ज़हीर उस्मान (सुन लड़की दबे पांव आते हैं सभी मौसम, लोमड़ियां, नमस्कार आज शुक्रवार है, कल्पना पिशाच), स्वयंप्रकाश (घर कैद, फिनिक्स), सरताज माथुर, मंगल सक्सेना, राजानन्द, रणवीर सिंह, मदनमोहन माथुर, अर्जुन देव चारण, डी एन शैली, एस वासुदेव प्रमुख हैं।

 

आलोचना

 

यह बात विस्मयकारी है कि बीसवीं सदी के प्रारम्भ में राजस्थान में गद्य की सर्जनात्मक विधाओं की तुलना में आलोचना में अधिक और महत्वपूर्ण काम हुआ। हिन्दी में जब आलोचना का उदय हो ही रहा था तब राजस्थान में गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवीप्रसाद मिश्र और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की त्रयी सक्रिय थी। इस आलोचक त्रयी का वर्चस्व नागरी प्रचारिणी पत्रिका के सम्पादन पर भी रहा। इसी दौर में शोध-संपादन के क्षेत्र में मुनि जिन विजय ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया। लगभग इसी समय यहाँ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समकालीन और उनसे प्रभावित रामकृष्ण शुक्ल 'शिलीमुख' ने साहित्यिक आलोचना की शुरुआत की। इनकी पुस्तक 'आलोचना समुच्चय' शुक्ल जी से प्रभावित होते हुए भी उनसे भिन्न स्थापनाओं के लिए जानी जाती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की ही परंपरा में यहाँ के दो और आलोचकों सूर्यकरण पारीक और मोतीलाल मेनारिया को भी याद किया जाना आवश्यक है। लेकिन शिलीमुख के बाद आलोचना के क्षेत्र में राजस्थान का सबसे बड़ा नाम है डॉ. देवराज उपाध्याय। उपाध्याय जी ने साहित्य की आलोचना और मूल्यांकन के लिए सर्वथा नई एक पद्धति, मनोविश्लेषणात्मक पद्धति का प्रवर्तन किया। इस पद्धति के आधार पर उन्होंने जैनेन्द्र कुमार और इलाचन्द्र जोशी के कथा साहित्य का जो मूल्यांकन विश्लेषण किया उसे बहुत सराहा गया।

स्वाधीनता प्राप्त के बाद राजस्थान में भी उच्च शिक्षा का खूब प्रसार हुआ और इस साहित्य के पठन-पाठन के लिए अकादमिक आलोचना की ज़रूरत पड़ी। इस ज़रूरत को पूरा किया नरोत्तम दास स्वामी, दशरथ ओझा, सोमनाथ गुप्त, सरनाम सिंह शर्मा, रामगोपाल शर्मा दिनेश, कृष्णकुमार शर्मा आदि ने। लगभग इसी समय हिन्दी में प्रगतिवादी आन्दोलन फल-फूल रहा था और उसके प्रभाव से साहित्य को मार्क्सवादी नज़र से समझने विश्लेषण करने के क्रम में मार्क्सवादी आलोचना की धारा पुष्ट हो रही थी। राजस्थान में साहित्य को इस नज़र से समझने और समझाने वाले आलोचकों में रांगेय राघव, विश्वम्भर नाथ उपाध्याय, नवल किशोर, जीवन सिंह, माधव हाड़ा का अवदान मूल्यवान है। डॉ. नवलकिशोर की पुस्तक

'मानववाद और साहित्य' को व्यापक सराहना मिली। जिन आलोचकों ने किसी विचारधारा की बजाय साहित्य के औज़ारों से ही साहित्य का मूल्यांकन करने की राह चुनी उनमें नन्द किशोर आचार्य, मोहनकृष्ण बोहरा, जगदीश शर्मा मुख्य हैं। प्रान्त के अनेक कवियों ने भी कवि कर्म के निर्वाह के साथ साथ आलोचनात्मक लेखन भी किया। इनमें नन्द चतुर्वेदी, ऋतुराज, नन्द किशोर आचार्य, विजेन्द्र, रमाकान्त शर्मा प्रमुख हैं।

 

गद्य की अन्य विधाएं

 

राजस्थान में कथेतर गद्य की लम्बी परंपरा रही है। गद्य गीत के क्षेत्र में जनार्दन राय नागर और दिनेशनन्दिनी डालमिया के कृतित्व को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। अब यह विधा धीरे-धीरे लुप्त ही होती जा रही है। रिपोर्ताज विधा को समृद्ध करने वाले रचनाकारों में सत्यनारायण (इस आदमी को पढो, यहीं कहीं नींद थी, जहां आदमी चुप है, तारीख की खंजड़ी) पूरे हिन्दी जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। राजस्थान के पर्यटन और दर्शनीय स्थलों पर केन्द्रित सावित्री परमार के रिपोर्ताज अपने ललित गद्य और यहां की समृद्ध विरासत के अभिलेखन के लिए हमेशा याद किये जाएंगे। कुछ अध्येताओं का मानना है कि संस्मरण विधा का आरम्भ ही राजस्थान से हुआ है। सूर्यकरण पारीक हमारे प्रारंभिक संस्मरण लेखकों में से एक हैं। इस विधा में सबसे अधिक स्मरणीय काम किया गोपालदास (मोहे बिसरत नाहीं) ने। इस पुस्तक का हर संस्मरण अनूठा, मर्मस्पशी और अविस्मरणीय है। नन्द चतुर्वेदी ने भी 'अतीत राग' पुस्तक में कुछ बहुत ही मर्मस्पशी संस्मरण लिखे हैं। शंकर सहाय सक्सेना ने अनेक क्रान्तिकारियों और स्वतन्त्रता सेनानियों की तथा राजेन्द्रमोहन भटनागर ने बहुत सारे महापुरुषों की जीवनियाँ लिख कर जीवनी विधा को समृद्ध किया है। यात्रा वृत्तान्त लिखने वालों में जवाहिर लाल जैन (दिल्ली-पीकिग, यूरोप के सात देशों में क्या देखा क्या समझा, दिल्ली से दिल्ली) घनश्याम दास बिड़ला (बिखरे विचारों की भरोटी), भगवान दास केला (मेरी सर्वोदय यात्रा), राजेन्द्र शंकर भट्ट (मेरी का मीर यात्रा), मरुधर मृदुल (यात्रा के बहाने, खुली आंखों का सपना) कर्पूर चन्द्र कुलिश (मैं देखता चला गया), सुदेश बत्रा (क्षितिज के उस पार), दुर्गाप्रसाद अग्रवाल (आंखन देखी) के लेखन को बहुत सराहा गया है। साक्षात्कार विधा में विष्णु पंकज ने खूब काम किया है और नन्द भारद्वाज (संवाद निरन्तर) ने इस विधा को नई ऊंचाइयां दी हैं।

कथेतर गद्य में व्यंग्य की लोकप्रियता असंदिग्ध है। वैसे तो चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के ललित निबंधों और सूर्यकरण पारीक के निबंधों में भी व्यंग्य के छींटे मिलते हैं लेकिन राजस्थान में व्यंग्य लेखन को असल गति स्वाधीनता प्राप्त के बाद ही मिली। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के प्रकाशन ने इसे खूब प्रोत्साहित किया। अशोक शुक्ल प्रान्त के अनूठे व्यंग्यकार हैं। राजस्थान में केवल उन्होंने और सुधीर राखेचा ने व्यंग्य उपन्यास लिखे हैं। भगवती लाल व्यास (पौ बारह पच्चीस, आलपिनों का आसन, परदे के आगे परदे के पीछे, सरकने वाली गाड़ी, मुस्कराते व्यंग्य), बुलाकी शर्मा (दुर्घटना के इर्द गिर्द), फारूक आफरीदी( मीनमेख, बुद्धि का बफर स्टांक), पूरन सरमा (16 व्यंग्य संग्रह), अनुराग वाजपेयी (रगिस्तान में बाढ उत्सव, अन्न का श्राद्ध, खादी का रुमाल, रैली में खोए जूते), अतुल कनक (चलो चूना लगाएं), मनोहर प्रभाकर (आप बीती, अति सर्वत्र वर्जयेत, वक्र बखान), ईश मधु तलवार (इशारों इशारों में), यश गोयल (गुणसूत्र, मन्त्री का चश्मा, कुर्सी का देवदास), यशवन्त कोठारी (कुर्सी सूत्र, मास्टर का मकान, हिन्दी की आखिरी किताब, राजधानी और राजनीति), यशवन्त व्यास (अब तक छप्पन), हरदर्शन सहगल (झूलता हुआ ग्यारह दिसम्बर), देव कोठारी अशोक राही ने नियमित रूप से उत्कृष्ट और बेधक व्यंग्य लिख कर इस विधा को समृद्ध किया है।

 

साहित्यिक संगठन व संस्थाएं

 

राजस्थान में हिन्दी साहित्य के प्रचार–प्रसार और संवर्धन का काम करने वाली अनेक गैर सरकारी संस्थाएं और संगठन हैं। स्वाभाविक ही है कि इनमें से कुछ अधिक सक्रिय हैं तो कुछ कम। पश्चिमी राजस्थान में हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए सबसे ज्यादा काम किया है। जोधपुर की अन्तर प्रान्तीय कुमार साहित्य परिषद् ने इस संस्था ने अपने संस्थापक नेमी चन्द्र जैन 'भावुक' के नेतृत्व और मार्गदर्शन में न केवल बड़े शहरों अपितु बहुत छोटे कस्बों और गांवों तक में सार्थक आयोजन कर साहित्यिक चेतना का प्रसार किया। इसी तरह कोटा की भारतेन्दु समिति और भरतपुर की हिन्दी साहित्य समिति ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में यही काम किया। राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति श्री डूंगरगढ़, हिन्दी विश्वभारती बीकानेर, हिन्दी साहित्य संसद चुरू, सिंध राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जयपुर, राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान जयपुर, युगधारा उदयपुर, साहित्य संगम अलवर, संभावना जोधपुर ने भी निरन्तर अनेक उम्दा आयोजन किए और नए रचनाकारों को मंच प्रदान किया। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद ही राजस्थान में प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ भी गठित हुए और इन्होंने प्रान्तीय तथा स्थानीय स्तरों पर कई उम्दा आयोजन किए। इधर के वर्षों में जसम ने भी सक्रिय होकर अनेक सार्थक आयोजन किए हैं।

 

आज़ादी मिलने के बाद राजस्थान में 1958 में स्वायत्तशाषी संस्थान राजस्थान साहित्य अकादमी की भी स्थापना हुई। प्रारंभ में अकादमी राज्य सरकार की शासकीय इकाई के रूप में कार्यरत थी और हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत, ब्रज और उर्दू भाषाओं व साहित्य के संवर्धन का दायित्त भी इसी का था। 1962 में अकादमी को स्वायत्तता प्रदान कर दी गई। राज्य सरकार 1980 में ब्रज, संस्कृत, राजस्थानी और उर्दू के लिए अलग अकादमियां स्थापित कर दी, तब से राजस्थान साहित्य अकादमी प्रदेश में हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का काम कर रही है। अकादमी ने हिन्दी भाषा और साहित्य की रचनात्मकता के प्रोत्साहन और संरक्षण के लिए अनेक काम किए हैं जैसे प्रकाशन, संस्थाओं को आर्थिक सहयोग, प्रकाशन हेतु आर्थिक सहयोग, पुरस्कार, लेखकों को आर्थिक सहायता, साहित्यिक आयोजन, रचनाकार सम्मान, अन्तरप्रान्तीय बन्धुत्व यात्रा आदि। अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार मीरा पुरस्कार है। अकादमी मधुमती नाम से एक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन करती है।

 

 

साहित्यिक पत्रिकाएं

 

पिछली सदी के प्रारंभ में राजस्थान से निकलने वाली पत्रिका 'समालोचक' की ख्याति बहुत अधिक रही है। लेकिन राजस्थान में साहित्यिक पत्रिकाओं की सक्रियता का असल दौर इस सदी के सातवें दशक से शुरू होता है। उदयपुर से नन्द चतुर्वेदी आदि के संपादन में निकलने वाली 'बिन्दु', अजमेर से प्रकाश जैन के सम्पादन में निकलने वालीलहर 'लहर ', बीकानेर से हरीश भादानी द्वारा संपादित 'वातायन', भीनमाल जैसे बहुत छोटे कस्बे से स्वयंप्रकाश और मोहन श्रोत्रिय के संपादन में निकलने वाली 'क्यों', कांकरोली से कमर मेवाड़ी के सम्पादन में निकलने वाली 'संबोधन', जोधपुर से हसन जमाल के सम्पादन में निकलने वाली दो भाषाओं की पत्रिका 'शेष', जयपुर से विजेन्द्र के सम्पादन में निकलने वाली 'कृति ओर', चन्द्रभानु भारद्वाज के सम्पादन में 'सम्प्रेषण' ऐसी पत्रिकाएं हैं जिनके महत्व और अवदान को सर्वत्र स्वीकारा और सराहा गया है। लोक साहित्य विषयक पत्रिकाएं परंपरा और रंगायन ने भी अपने विशिष्ट अनुशासन में उत्कृष्ट योग दिया। हाल ही में उदयपुर से पल्लव के संपादन में प्रकाशित होने लगी पत्रिका बनास ने पूरे साहित्य जगत की प्रशंसा अर्जित की है। इस पत्रिका का हर अंक किसी एक रचनाकार या रचना विशेष पर केन्द्रित रहता है। राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमती निरन्तर प्रकाशित हो रही है।

 

पुरस्कार व सम्मान

 

राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा अपने सर्वोच्च मीरा पुरस्कार के अतिरिक्त साहित्य की विविध विधाओं के लिए सुधीन्द्र (काव्य), रांगेय राघव (कथा, उपन्यास), देवराज उपाध्याय (निबंध, आलोचना), कन्हैयालाल सहल (विविध विधाएं), सुमनेश जोशी (प्रथम प्रकाशित कृति पर) और शम्भूदयाल सक्सेना (बाल साहित्य) पुरस्कार हर वर्ष प्रदान किए जाते हैं। अकादमी इन पुरस्कारों के अतिरिक्त उत्कृष्ट साहित्यकारों को साहित्य मनीषी और विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से भी नवाज़ती है।

के.के.बिड़ला फाउण्डेशन भी प्रतिवर्ष राजस्थान के किसी एक रचनाकार को बिहारी पुरस्कार से सम्मानित करता है। प्रारम्भ में यह पुरस्कार राजस्थान के लेखक की उत्कृष्ट हिन्दी कृति पर दिया जाता

था, परन्तु वर्ष 2003 से इसमें हिन्दी के साथ राजस्थानी को भी सम्मिलित कर लिया गया है।

भारत सरकार गणतन्त्र दिवस पर जो पद्म अलंकरण प्रदान करती है उनमें भी कई बार राजस्थान के हिन्दी साहित्यकार अपनी रचनाशीलता के लिए अलॅकृत हुए हैं। माणिक्य लाल वर्मा (पद्म विभूषण), हरिभाऊ उपाध्याय, गोकुल भाई भट्ट, झाबरमल्ल शर्मा, डॉ लक्ष्मीमल सिंघवी (पद्म भूषण), और मुनि जिन विजय, देवी लाल सामर, विजय दान देथा (पद्मश्री) भारत सरकार द्वारा पद्म अलंकरणों से अलंकृत राजस्थान के कुछ प्रमुख हिन्दी साहित्यकार हैं। राजस्थान का एक लोकप्रिय समाचार पत्र पिछले कुछ वर्षों से अपने यहां प्रकाशित एक कहानी और एक कविता को पुरस्कृत करता है। इसके अतिरिक्त भी अनेक संस्थाएं और संगठन साहित्यिक सम्मान और पुरस्कार प्रदान करते हैं।

 

राजस्थानी साहित्य

 

हिन्दी की लोकप्रियता से पहले तक राजस्थान में राजस्थानी ही बोली और समझी जाती थी और अब भी हिन्दी के साथ इसका व्यापक प्रयोग होता है। मेवाड़ी, मारवाड़ी, मालवी, बागड़ी आदि इसकी बोलियां हैं। इन बोलियों पर आस-पास की भाषाओं का प्रभाव भी पड़ा है। राजस्थानी में साहित्य की समृद्ध परंपरा है। मध्यकाल में इसके ब्रज मिश्रित साहित्यिक रूप को पिंगल कहा जाता था और साहित्यिक राजस्थानी डिंगल के नाम से भी जानी जाती थी। 14 वीं शताब्दी के बाद इनमें विपुल साहित्य मिलने लगता है। हम यहाँ आधुनिक काल के राजस्थानी साहित्य की चर्चा करेंगे, जो सामान्यतः सन् 1857 के बाद लिखा गया।

 

सूर्यमल मिश्रण ने राजस्थानी जन मानस में जिस राष्ट्रीय चेतना का शंखनाद किया था वही आगे चलकर आधुनिक काल के अनेक कवियों की कविताओं में मुखरित हुई। और यहीं यह बात भी कह दी जाए कि अपने समय में राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष करने वाले सूर्यमल मिश्रण अकेले कवि नहीं थे। उन्हीं के साथ कविराजा बाँकीदास और शंकरदान सामोर का भी नाम लिया जाना ज़रूरी है। लेकिन हम तो बात आधुनिक काल की कर रहे हैं, और आधुनिक का सम्बंध केवल काल से ही नहीं विचार से, सोच से भी होता है। सोच की दृष्टि से ऐसे कि जीवन को देखने-समझने की वैज्ञानिक दृष्टि और यथार्थपरक दृष्टिकोण भी आधुनिकता के लिए आवश्यक हैं। तो इस तरह से देखें तो हमारा ध्यान सबसे पहले कवि ऊमरदान की कविताओं पर जाता है जो छप्पन के दुष्काल से त्रस्त जनता के दुखों का मार्मिक चित्रण करते हैं और पाखण्डी साधुओं को बेनकाब करते हुए जनता को उनसे सावधान रहने को कहते हैं। इस आधुनिकता बोध के चलते हमारे विवेच्य आधुनिक काल तक आते-आते राजस्थानी की कविता हिन्दी की कविता के समानान्तर चलती दिखाई देती है और यहां के कवि अपने परंपरागत छन्दों में आज़ादी की अलख जगाते नज़र आते हैं। केसरीसिंह बारहठ, विजयसिंह पथिक, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, गोकुल भाई भट्ट, माणिक्यलाल वर्मा, जनकवि गणेशीलाल व्यास उस्ताद राजस्थान के ऐसे कवि हैं उन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लेने के साथ ही इस लड़ाई के लिए अपनी कलम को भी हथियार बनाया। इनमें से गणेशी लाल व्यास उस्ताद ऐसे कवि हैं जिन्होंने खुद आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया और आज़ादी के बाद के अपने मोहभंग को भी कविताओं में प्रखर रूप से अभिव्यक्त किया। राजस्थानी के अनेक कवियों की तत्कालीन कविताओं में राजस्थान के सामन्ती परिवेश के प्रति आक्रोश के स्वर सुनाई पड़ते हैं। ऐसे कवियों में रेवतदान चारण प्रमुख हैं जो सामन्ती शोषण के प्रति जन चेतना को जगाने का काम करते हैं। उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हैं मनुज देपावत और हरीश भादाणी

राजस्थानी के अनेक कवियों ने जन-जन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कवि सम्मेलन के माध्यम का भी अच्छा इस्तेमाल किया। एक समय था जब राजस्थानी कवि मेघराज मुकुल की 'सेनाणी' कवि सम्मेलनों की सर्वाधिक लोकप्रिय कविताओं में गिनी जाती थी। कवि सम्मेलनों में छा जाने वाले हमारे अन्य कुछ कवि थे सत्यप्रकाश जोशी, गजानन वर्मा, रघुराजसिंह हाडा, कल्याणसिंह राजावत, और प्रेमजी प्रेम। इन सभी कवियों का पाठ जितना प्रभावशाली था, कविताएं भी उतनी ही सशक्त थीं। इन कवियों में से सत्यप्रकाश जोशी अपने मौलिक और गैर पारंपरिक सोच के लिए अलग से उल्लेख योग्य हैं। 1960 में प्रकाशित उनकी काव्य कृति 'राधा' इस दृष्टि से रेखांकनीय है कि जहाँ आम राजस्थानी कविता युद्ध का गौरव गान करती है, जोशी यहाँ अपनी नायिका राधा के माध्यम से श्रीकृष्ण को यह सन्देश देकर कि वे महाभारत का युद्ध टाल दें, युद्ध के विरोध में खड़े नज़र आते हैं। अपनी एक अन्य रचना, लम्बी कविता 'बोल भारमली' में जोशी नारी मुक्ति का सन्देश भी देते हैं। छायावादी शैली की प्रकृति परक कविताओं से अपनी काव्य यात्रा शुरू करने वाले कवि नारायण सिंह भाटी भी इसलिए बेहद महत्वपूर्ण हैं कि वे बहुत जल्दी अपना मुहावरा तलाश कर राजस्थानी भाषा और साहित्य को नया संस्कार दे पाते हैं। उनकी वे कविताएँ जहां वे दुर्गादास को नई दृष्टि से और मीरा को नारी मुक्ति के कोण से चित्रित करते हैं बेहद महत्वपूर्ण हैं। राजस्थानी एक और महत्वपूर्ण कवि हैं कन्हैया लाल सेठिया। उनके गीत 'धरती धोरां री' को तो राष्ट्रगीत की तर्ज पर राजस्थान का राजगीत कहा ही जा सकता है, विशेष बात यह कि सेठिया जी अपने आदर्शवादी संस्कारों का पूर्ण निर्वाह करते हुए अपने समय और समाज की पड़ताल करते हैं। 'मीझर' और 'लीलाटॉस' सेठिया जी के प्रमुख काव्य संग्रह है। किशोर कल्पनाकान्त भी आदर्श और सन्तुलन के कवि हैं लेकिन उनकी कविता में बाह्य की अपेक्षा आन्तरिक पर अधिक बल है। इस प्रकार सातवें दशक के मध्य तक राजस्थान की आधुनिक कविता का पहला दौर चला और इस दौर में अनेक कवियों ने विभिन्न विषम परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट सृजन किया। यही वह समय था जब देश, समाज और राज्य में व्यापक बदलाव हो रहे थे और प्रान्त में राजस्थानी भाषा में 'मरुवाणी', 'जलमभोम', 'जांणकारी', 'ओळमों', 'लाडेसर', 'हरावळ', 'राजस्थली', 'ईसरलाट', 'राजस्थानी-एक हेलो', 'दीठ', 'चामळ', 'अपरंच' जैसी अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही थीं या होने लगी थीं और इनके माध्यम से बहुत सारे नए कवि सामने आ रहे थे। उधर हिन्दी में नई कविता की हलचल तेज़ थी और इधर राजस्थानी के कवि भी अपनी कविता को नया संस्कार देने में जुटे थे। यही वह समय है जब पारस अरोड़ा 'अंधारै रा घाव', गोरधनसिंह शेखावत की ‘गाँव', 'रंग-बदरंग और पनजी मारू संग्रह की कविताएं, तेजसिंह जोधा की 'कठैई की व्हेगौ है', 'म्हारा बाप' और 'दीठाव रै बेजां मॉय' कविताएं, मणि मधुकर की 'सोजती गेट', आलीजा आज्यो घरां और 'पगफेरो', हरीश भादाणी की 'बोलै सरणाटौ', 'हूणियै रा सोरठा' और 'बाथा में भूगोळ' संग्रह की कविताएं, मोहम्मद सद्दीक की 'जूझती जूण और अन्तसतास की कविताएँ, मोहन आलोक की "चित मारो दुख नै सँग्रह की कविताएं, चन्द्रप्रकाश देवल की 'पागी', 'कावड', तोपनामा, 'राग-विजोग' इत्यादि संग्रहों की कविताएं, सांवर दइया की 'आ सदी मिजळी मरै', अर्जुनदेव , चारण की "रिन्दरोही', मालचन्द तिवाड़ी की 'उतर्यो है आभौ', वासु आचार्य की 'सीर रौ घर', भगवतीलाल व्यास की 'अणहद नाद' और 'अगनी मन्तर' संग्रह की कविताएं और इसी व इससे बाद के दौर के अन्य कवियों खासतौर पर ज्योतिपुंज, उपेन्द्र अणु, ॲबिकादत्त, आईदानसिंह भाटी, ओम पुरोहित कागद, मीठेश निर्मोही और कई एकदम ताज़ा कवियां में अतुल कनक, सुमन बिस्सा, भविष्यदत्त भविष्य, नीरज दइया, सन्तोष मायामोहन, मदनगोपाल लड्डा इत्यादि की कविताएं राजस्थानी कविता को

आधुनिक भावबोध और समकालीन अभिव्यक्ति से समृद्ध कर रही हैं।

राजस्थानी की कविता अपने समय में लिखी जा रही हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की कविता के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है और साहित्य की विशाल और बहुरंगी दुनिया में राजस्थान की अलग पहचान भी बनाए हुए है।

राजस्थानी में कथा की परंपरा भी बहुत प्राचीन है। राजस्थानी लोककथाओं, लोक गाथाओं और वातों का तो एक विराट संसार है ही, आधुनिक काल में भी राजस्थानी में उत्कृष्ट कथा सर्जना हुई है। रानी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत ने जहां राजस्थान के अतीत को सजीव करने वाली ऐतिहासिक सांस्कृतिक गरिमापूर्ण कहानियाँ लिखीं (मांझळ रात, अमोलक वातां, मूमळ, गिर ऊंचा ऊंचा गढ़ां, कै रे चकवा बात, राजस्थानी लोक गाथा श्रीमती चूण्डावत के कहानी संग्रह हैं), वहीं विजयदान देथा ने अपनी वातां री फुलवाड़ी (13 खण्ड) श्रृंखला में राजस्थान की कदीमी लोककथाओं का कुछ ऐसा अनूठा पुनःसृजन किया कि उन्हें सर्वत्र सराहा गया। विजयदान देथा ने इस पुनःसृजन के अतिरिक्त खूब सारा मौलिक कथा सृजन भी किया। विजयदन देथा के कुछ प्रमुख राजस्थानी-हिन्दी कहानी संग्रह हैं दुविधा, उलझन, अलेखू हिटलर, लजवन्ती, सपन प्रिया, अन्तराल | राजस्थानी के साथ-साथ हिन्दी में भी बहु प्रशंसित यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की कहानियां उनके संग्रहों जमारो, समन्द अर थार में संकलित हैं और उनके कुछ प्रसिद्ध उपन्यास हैं 'हूं गोरी किण पीव री', जोग-संजोग, चान्दा सेठाणी। राजस्थानी ग्राम्य जीवन के अनूठे चितेरे अन्ना राम सुदामा के कुछ प्रमुख कहानी संग्रह हैं आँधै नै आँख्यां, गळत इलाज अर माया रौ रंग। उनके चर्चित उपन्यास हैं मैकती कायाः मुलक़ती धरती, ऑधी अर आस्था, मेवै रा रूंख, अचूक इलाज, घर-संसार अर डंकीजता मानवीनृसिंह राजपुरोहित भी ग्राम्य जीवन के चित्रा के लिए ही सुपरिचित हैं और उनके कुछ प्रमुख कहानी संग्रह ये हैं: रातवासौ, मऊ चाली माळवै, अमर चूंनड़ी, परभातियौ तारौ, अधूरा सपनां भगवान महावीर राजपुरोहित जी का उपन्यास है। बैजनाथ पंवार के कहानी संग्रह हैं लाडेसर, नैणां खूट्यौ नीर, अकल बिना ऊंट उभाणौ, ओळखांणरामे वरदयाल श्रीमाली के कहानी संग्रह ‘सळवटां', 'जाळ' और 'श्रीलाल' नथमल जोशी के कहानी संग्रह 'परण्योड़ी-कंवारी', मैंधी कनीर अर गुलाब तथा उपन्यास 'आभै पटकी, 'धोरां रौ धोरी', 'एक बीनणी दो बीन, सरणागर शीर्षक से प्रकाशित और चर्चित हुए। नेमनारायण जोशी की ख्याति उनके बहु चर्चित कथा-संस्मरण संग्रह 'ओळू री अखियातां' के कारण है। करणीदान बारहठ के कहानी संग्रह 'आदमी रौ सींग', 'माटी री महक तथा उनके उपन्यास 'मन्त्री री बेटी', 'बड़ी बहनजी' हैं। नन्द भारद्वाज जिन्होंने अनेक विधाओं में लिखा है, का उपन्यास ‘सॉम्ही खुलती मारग’ मूल राजस्थानी में और बाद में अपने अनूदित हिन्दी रूप में बहुत सराहा गया। आपने राजस्थानी में बेहतरीन कहानियाँ भी लिखी हैं। बी एल माली अशान्त के कहानी संग्रह 'किली-किली कटको', 'राई राई रेत', 'सौ कहाणियां रौ सफर और उनके उपन्यास 'मिनख रा खोज', 'अबोली', 'बुरीगार नज़र' हैं। राजस्थानी के एक और महत्वपूर्ण कथाकार हैं मालचन्द तिवाड़ीउनके कहानी संग्रह 'धड़न्द', सेलिब्रेसन और उपन्यास 'भोळावण' हैं। रामकुमार ओझा बुद्धिजीवी, चन्द्रप्रकाश देवल, चेतन स्वामी (कहानी संग्रह ऑगणै बिचाळे भीतॉ, किस्तूरी मिरग), जेबा रशीद(कहानी संग्रह ‘नांव बिहुणा रिश्ता', 'आभै री आंख्यां और उपन्यास 'नेह रौ नातौ'), मीठेश निर्मोही( कहानी संग्रह 'अमावस एकम अर चान्द'), जैसे कथाकारों ने अपनी कहानियों और उपन्यासों से राजस्थानी भाषा को गौरवानवत किया है। माधव नागदा, ओमप्रकाश भाटिया (कहानी संग्रह 'सुर देवता'), भरत ओळा(कहानी संग्रह 'जीव री जात', 'सेक्टर नंबर 5'), दिनेश पांचाल(कहानी संग्रह 'शान्ति नो सूरज अर पगरवा'), मेजर रतन जाँगिड़ (कहानी संग्रह 'माई एहड़ा पूत जण', और उपन्यास 'सीमा री पीड़', 'फुल्ली देवा') बहुत उम्मीद जगाते हैं।

कथा साहित्य की ही भांति स्थिति है नाटक और एकांकी की। जिन नाटककारों ने राजस्थान की समृद्ध नाट्य परंपरा से प्रेरणा लेकर मौलिक सृजन और रंग कर्म किया है उनमें मणि मधुकर, भंवर भादानी, भानु भारती, अर्जुन देव चारण प्रमुख हैं। गद्य की इतर विधाओं जैसे रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा वृत्तान्त, व्यंग्य आदि के क्षेत्र में जहूर खां मेहर, ब्रजनारायण पुरोहित, गोरधनसिंह शेखावत, ओंकार पारीक, नेमनारायण जोशी, का दाय महत्व का अधिकारी है। रामकुमार ओझा बुद्धिजीवी का यात्रा संस्मरण धुड़ पड्या पग डूंगर डेरा, बैजनाथ पंवार का संस्मरण संग्रह जीवता जागता चितराम, सांवर दैया का व्यंग्य संग्रह आड़ी तिरछी ओळ्यां, बी एल माली अशान्त के निबंध संग्रह माटी तूं मजाक, पावड़ा पड़ाव अर मजल, तारां छाई रात, सोध समदर सीपियां, माधव नागदा की डायरी सोनेरी पांख्या वाळी तितलियां और आलोचना के क्षेत्र में नन्द भारद्वाज की किताब 'दौर अर दायरौ' बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। राजस्थानी के अनेक रचनाकारों ने हिन्दी, अन्य भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं से राजस्थानी में अनुवाद भी किए हैं। राणी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत ने रवि ठाकर री वातां, रूसी कहानियां, संसार री नामी कहाणियाँ, मनोहरसिंह राठौड़ ने भी रवीन्द्र नाथ री कहाणियाँ, चन्द्रप्रकाश देवल ने दोस्तोयेवस्की के उपन्यास, सेमुएल बैकेट के नाटक और अन्य अनेक कृतियों के अनुवाद, रामस्वरूप किसान ने रवीन्द्र नाथ टैगोर के नाटक रक्त 'करबी का राती कणेर' शीर्षक से अनुवाद, नृसिंह राजपुरोहित ने टाल्सटाय री टाळवी कथावां, नन्द भारद्वाज ने अल्बेयर कामू के उपन्यास का 'बैतियाण शीर्षक से अनुवाद कर अपनी भाषा को समृद्ध किया है। .

 

राजस्थानी के अनेक साहित्यकारों को समय-समय पर उनकी रचनाशीलता के लिए पुरस्कृत व सम्मानित भी किया गया है। भारत सरकार ने कोमल कोठारी को दो बार पद्म अलंकरणों (पद्म श्री और पद्मभूषण) से अलंकृत किया है। सीताराम लालस (राजस्थानी शब्द कोश के रचनाकार), रानी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत, विजय दान देथा और डॉ चन्द्र प्रकाश देवल को पद्मश्री से अलंकृत किया जा चुका है।

 

आज राजस्थानी भाषा में सभी विधाओं में साहित्य सृजन हो रहा है। अपनी परम्पराओं से जुड़ा रहकर भी इस भाषा का साहित्य आधुनिक भाव बोध का संवहन कर रहा है और नित नूतन प्रयोग कर अपनी जीवन्तता और सामय का परिचय दे रहा है। राजस्थानी में नए लिखने वालों की संख्या तो निरन्तर बढ़ती ही जा रही है, नई पीढी संचार के अधुनातन साधनों जैसे इंटरनेट का प्रयोग भी पूरे उत्साह से कर रही है। अब राजस्थानी की बहुत सारी रचनाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं और राजस्थानी भाषा और साहित्य के बारे में तथा राजस्थानी में बहुत सारे ब्लांग भी लिखे जा रहे हैं।

 

जयपुर साहित्य महोत्सव

 

वर्ष 2006 में जयपुर साहित्य महोत्सव नाम से एक छोटी-सी शुरुआत हुई थी। तब किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि मात्र पांच बरसों में यह महोत्सव इतना विराट रूप ले लेगा कि इसे द ग्रेटेस्ट लिटरेरी शो ऑन अर्थ कहा जाने लगेगा। जयपुर में हर साल 21 से 25 जनवरी तक होने वाला यह पांच दिवसीय साहित्यिक मेला अब दुनिया भर के लेखकों-विचारकों-कलाकारों को आकृष्ट करता है और साहित्य प्रेमियों को उनसे रू-ब-रू होने का अवसर प्रदान करता है। इस आयोजन में कई नोबल, पुलिट्ज़र व अन्य पुरस्कार विजेता साहित्यकारों और विख्यात चिन्तकों, कलाकारों की सहभागिता रही है। आयोजन में प्रवेश नि:शुल्क होता है। राजस्थान में साहित्यिक चेतना के प्रसार की दृष्टि से यह आयोजन विशेष उल्लेख का हकदार है।

 

 

 

 

 

 



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राजस्थानी भाषा या बोली

राजस्थानी भाषा/बोली राजस्थानी भाषा :—   राजस्थान के लोगों की मातृभाषा विक्रम संवत 835 (913 ई. ) में उद्योतन सूरी ने अपने ग्रंथ कुवलयमाला में 18 देशी भाषाओं का वर्णन किया जिसमें ''मरूभाषा'' ( पश्चिमी राजस्थान की भाषा ) भी सम्मिलित थी। राजस्थानी शब्द का प्रयोग जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन  ने अपने ग्रंथ 1907 -08 में "भारतीय भाषा विश्वकोष" में किया। राजस्थान की भाषा के लिए राजस्थानी शब्द का प्रयोग इस प्रदेश में प्रचलित विभिन्न भाषाओं के सामूहिक नाम पर सबसे पहले जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 ईस्वी में ''लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया'' में किया। राजस्थानी का स्वतंत्र भाषा के रूप में वैज्ञानिक विश्लेषण सर्वप्रथम जॉर्ज इब्राहिम गयर्स ने अपने ग्रंथ लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया के  9 वें खण्ड के दूसरे भाग में किया था । कवि कुशललाभ के ग्रंथ पिंगल शिरोमणि तथा अबुल फजल के आईने अकबरी में भी ''मारवाड़ी'' शब्द का प्रयोग किया गया है। 17 वीं शताब्दी की नोबोलिछंद व 18 वीं शताब्दी की आठ देसरी गुजरी नामक रचनाओं में ''मरू...

राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय

  राजस्थान के प्रमुख संत व संप्रदाय धन्ना राजस्थान में धार्मिक आंदोलन का श्रीगणेश करने का श्रेय धन्ना को ही है।  धन्ना का जन्म टोंक जिले के धुवन गाँव में 1415 ई. में जाट परिवार में हुआ था।  बाल्यकाल से ही इनकी प्रवृत्ति धार्मिक थी।  कालांतर में धन्ना काशी जाकर आचार्य रामानन्द के शिष्य बन गए ।  गुरु रामानंद के प्रभाव से ये निर्गुण उपासक हो गये।  गुरु रामानंद ने इन्हें घर पर रहकर ही भक्ति करने का आदेश दिया। इन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय कृषि में रत रहते हुए ही आत्म शु‌द्धि का प्रयास किया। धन्ना गुरु भक्ति में बड़ी निष्ठा रखते थे।  इनका मत था कि गुरु भक्ति से ही परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इन्होंने नाम-स्मरण को ही ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन माना है तथा औपचारिकताओं और बाह्याडम्बरों का विरोध किया। पीपा खींची राजपूत पीपा गागरौन (झालावाड़) के शासक थे।  यहीं पर संत पीपा की छत्तरी है।  इनका जन्म 1425 ई. में हुआ माना जाता है।  कालोपरान्त पीपा काशी जाकर रामानन्द के शिष्य बन गए।  धन्ना के समान ही इन्हें भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए भक्...

राजस्थान की प्रथाएं/कुप्रथाएं

  राजस्थान की  प्रथाएं/ कुप्रथाएं  सती प्रथा: –  भारत के अन्य क्षेत्रों के साथ राजपूताना में प्रचलित मृत पति के साथ जीवित विधवा पत्नी का चित्तारोहण कर जलकर नष्ट कर लेना। सहगमन / सहमरण- सती प्रथा की   प्रक्रिया अनुमरण- मृत पति के चिह्न / निशानी के   साथ जीवित विधवा पत्नी का  चित्तारोहण कर जलकर नष्ट कर लेना। महासती – अनुमरण करने वाली सती। माँ-सती – मृत पुत्र के साथ सती होने वाली माताएं।  राजस्थान में सर्वप्रथम सती प्रथा को बूंदी नरेश राव विष्णु सिंह ने 1822 ई. में गैर-कानूनी घोषित किया। राजा राम मोहन राय के प्रयासों से  तत्कालीन ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा 4 दिसंबर ,  1829 को बंगाल सती रेग्युलेशन पास किया गया था। इस कानून के माध्यम से पूरे ब्रिटिश भारत में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। 1829 के अधिनियम के तहत् रोक कोटा रियासत ने लगाई। सती प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य 510 ई. के   एरण अभिलेख (शासक- भानुगुप्त) से प्राप्त होता है।   राजस्थान में घटियाला अभिलेख 810 ई. में राजपूत ...